आश्रम के एक कर्मचारी दम्पति को अपने हिंसक स्वभाव के चलते नौकरी से हाथ धोना पड़ा – 12 मई 2014

बहुत समय नहीं हुआ जब हमारे यहाँ दो कर्मचारी रखे गए थे, एक दम्पति, जिनका अपरा से थोड़ा बड़ा एक बच्चा भी था। वे आश्रम में काम भी करते थे और यहीं रहते भी थे। हमारी तरफ से प्रदत्त बहुत सी सुविधाओं का उपभोग करते हुए यहाँ कई माह रहने के बाद हमने कुछ दिन पहले उन्हें बिदा कर दिया। हालाँकि हम लोग खुश थे कि वे लोग हमारे यहाँ आए और हमारे साथ रहे और वाकई हम चाहते थे कि वे रहे आएं और आश्रम में काम करें लेकिन अंततः हमें यही निर्णय करना पड़ा कि उनके और हमारे भले के लिए वे आश्रम छोड़ जाएं। मैं आपको पूरा किस्सा बताता हूँ।

आठ माह पहले जब वे आए थे, उनका बेटा सिर्फ दो साल का था और जैसा कि भारत में सामान्य रूप से होता है, पति-पत्नी दोनों लगभग रोज़ ही अपने बच्चे की पिटाई करते थे। शुरू में ही, जब हमें पता चला, हमने उनसे गंभीरता के साथ बात की और यहाँ के नियमों के बारे में उन्हें बताया कि हमारे आश्रम और स्कूल में किसी भी बच्चे को मारने-पीटने की सख्त मनाही है। हमारे यहाँ मजबूती के साथ अहिंसा की नीति का पालन किया जाता है और हम यह सुनिश्चित करते हैं कि हमारे कर्मचारी इस नीति का अनुपालन करें।

स्वाभाविक ही, उन्होंने बच्चे को न मारने का वादा किया और जब कई बार हमने उन्हें बच्चे को मारने की धमकी देते हुए सुना तो बच्चे के साथ ऐसी हिंसक भाषा का इस्तेमाल करने से भी उन्हें मना किया- स्वाभाविक ही, उनके अपने बच्चे के और हमारे बच्चे के भले के लिए ही! परिवर्तन हुआ, या कम से कम हमने समझा कि हुआ। अब हमें ऐसी कटु शब्दावलियाँ सुनाई नहीं देती थीं और हमने आगे बढ़कर, काफी प्रयास करते हुए उन्हें समझाने की कोशिश की कि बच्चे के साथ किस तरह एक अलग तरह का, प्यार भरा और अहिंसक व्यवहार किया जाना चाहिए।

लेकिन दुर्भाग्य से वे सिर्फ इस बात का प्रयास कर रहे थे कि ये गलतियाँ वे हमारे सामने न करें। एक बार हमारे साथ रहने वाला एक लड़का, पवन मुझे बुलाकर ले गया कि बच्चे की माँ उसे मार रही है। दूसरी बार बगीचे में मैंने खुद पिता को बच्चे की पिटाई करते हुए देखा। दोनों बार हमने प्रतिवाद किया और दोनों बार उन्होंने माफ़ी मांगते हुए भविष्य में ऐसा न करने का पक्का आश्वासन दिया और हर बार हमने उसे सुधरने का मौका दिया। हम सोच रहे थे कि उस बच्चे और उसके अभिभावकों को अपनी ज़िन्दगी में परिवर्तन लाने का हम एक सुनहरा मौका प्रदान कर रहे हैं। हम बच्चे से प्रेम करने लगे थे, सारे बच्चे साथ खेलते थे, मिलजुलकर आश्रम के सुन्दर पारिवारिक जीवन का आनंद उठा रहे थे।

लेकिन हम नहीं चाहते थे कि अपरा और आश्रम में रहने वाले उसकी उम्र के दूसरे बच्चे उनकी इस हिंसा से किसी भी तरह प्रभावित हों। तो एक दिन जब अपरा दौड़ती हुई आई और पूर्णेंदु को बताया कि उसके साथ खेलने वाले एक बच्चे के पिता ने उसकी माँ को मारा है तो हमारे धैर्य की सीमा समाप्त हो गई। हमें पता चला कि वह अक्सर अपनी पत्नी को मारता-पीटता रहता है और एक बार तो आश्रम-गेट के सामने सड़क पर, सबके सामने वह उसे पीट रहा था! उसकी पत्नी की आँखों में आंसू थे और स्पष्ट था कि वह आदतन अपनी पत्नी को मारता-पीटता रहता है और वे दोनों भी अपने बच्चे की अक्सर पिटाई करते रहते हैं। और इस बार तो हमारी बिटिया अपरा की आँखों के सामने।

हम बहुत परेशान और चिंतित हो उठे। हमने उन्हें सुधरने के लिए आठ महीने का लम्बा समय दिया था, हम सोच रहे थे कि हमने उन्हें आपस में और अपने बच्चे के विरुद्ध की जाने वाली आदतन हिंसा और कर्कश व्यवहार से उबार लिया है। लेकिन माहौल ही ऐसा बन गया था। जहाँ हम सोच रहे थे कि हम एक बच्चे के जीवन में थोड़ी-बहुत बेहतरी ला सकते हैं वहाँ ऐसा माहौल बन रहा था जो दूसरे बहुत से बच्चों के जीवन पर बुरा असर डाल रहा था। हमारे सामने प्रश्न था कि कि हम क्या करें? उन्हें नौकरी से अलग करना आश्रम के माहौल को बिगड़ने से रोक सकता था लेकिन क्या यह कदम उन्हें जीवन सुधारने का मिला एकमात्र मौका छीन लेगा?

अंत में हमारे आश्रम के एक अन्य कर्मचारी के साथ गुत्थमगुत्था होकर उन्होंने इस बात पर कोई फैसला लेने का हमारा अधिकार भी लगभग छीनकर खुद अपने हाथों में ले लिया था। बच्चे के पिता का पहले भी उससे कोई वाद-विवाद हुआ था लेकिन वह और बढ़कर अब मार-पीट में तब्दील हो गया था। इस बात ने हमारे धैर्य की सभी सीमाओं का उल्लंघन कर दिया था और हमारे पास इसके सिवा कोई चारा नहीं बचा था कि उन्हें नौकरी से निकाल देते।

तो, हमने यह निर्णय ले ही लिया और थोड़े समय बाद ही हमें पता चल गया कि हमारा निर्णय सही था। आश्रम का वातावरण अब बेफिक्र, निश्चल और पहले से काफी शांत हो गया है। फिर भी, हम इस छोटे से परिवार को शुभकामनाएँ अर्पित करते हैं, विशेषकर उस छोटे से बच्चे को, जिसे हम बेहतर भविष्य बनाने का मौका देना चाहते थे। यह संभव नहीं हुआ लेकिन कम से कम भविष्य के लिए हमें एक सबक तो मिल ही गया।

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