जयसिंह आश्रम छोड़कर चला गया – 6 अक्टूबर 2014

आश्रम

आज मैं आपको एक ऐसी बात बताने जा रहा हूँ, जो आश्रम में पहले भी घटित होती रही हैं। इस बार यह घटना काफी सालों बाद हो रही है और उसने आश्रम के वातावरण को बदल दिया है: कल जयसिंह आश्रम छोड़कर चला गया।

आप में से वे सभी, जो पिछले पाँच साल में आश्रम आए हैं, जयसिंह को अवश्य जानते होंगे। वह हमारे ‘आश्रम के बच्चों’ में से एक बच्चा है, या कहना चाहिए कि, था। जब वह छोटा बच्चा ही था, हम तब से उसका लालन-पालन आश्रम में कर रहे थे क्योंकि उसके अभिभावक समर्थ नहीं थे। आर्थिक मजबूरियों के चलते अपने बेहद गरीब पिता के सात बच्चों में से एक, वह 2009 में आश्रम आया और तभी से लगातार यहाँ रह रहा था। तब वह ग्यारह साल का था और अब सोलह साल का है।

जयसिंह अपने गाँव में पहले ही पढ़ाई कर चुका था लेकिन क्योंकि ग्रामीण इलाकों में पढ़ाई का स्तर बहुत खराब होता है, जब उसने हमारे स्कूल में पढ़ना शुरू किया तो उसे पुनः बिल्कुल नीचे से पढ़ाई शुरू करनी पड़ी। वह एक ऐसा लड़का था, जिसके लिए स्कूल और पढ़ाई-लिखाई कभी भी सबसे बड़ी प्राथमिकता नहीं रही और न ही समय बिताने का यह उसका पसंदीदा ज़रिया था। इसी कारण एक साल तो पढ़ाई को लेकर उसे बड़ी समस्याओं का सामना करना पड़ा और दोबारा उसी कक्षा में पढ़ाई करनी पड़ी। उसके बाद उसने पढ़ाई पर ध्यान दिया और दूसरे बच्चों के बराबर आ गया। वह एक सामान्य विद्यार्थी था और अब उसे फिर से किसी कक्षा में दोबारा पढ़ाई करने का खतरा नहीं रहा।

घर में, यानी आश्रम में, परिवार के एक सदस्य के रूप में हमारे मन में इस बालक के लिए मिश्रित भावनाएँ उमड़ती थीं-मेरे खयाल से, जैसी किसी भी अभिभावक के मन में अपने बच्चे के लिए उमड़ती हैं! जब शुरू में वह आया था तब काफी शैतान था और ऐसी कारस्तानियाँ किया करता था कि आज भी हम लोग याद करके हँसते हैं। लेकिन जैसे-जैसे साल बीतते गए, बच्चा एक समझदार युवा के रूप में विकसित होता गया। विशाल आश्रम परिवार के दैनिक जीवन की बहुत सी जिम्मेदारियाँ उसने वहन कर लीं और कहना चाहिए कि पिछले पाँच साल उसका लालन-पालन करके हमें गर्व का अनुभव होता है।

पिछले हफ्ते उसने हमें बताया कि वह आश्रम छोड़ना चाहता है। उसके अपने कारण थे, जिन्हें बहुत भावुक और उल्लसित होकर उसने हमें कहा कि पांचवीं कक्षा के हिसाब से उसकी उम्र बहुत जादा है और यह भी कि अब वह आगे पढ़ना नहीं चाहता। वह बाहर निकलकर अपना कोई काम-धंधा शुरू करना चाहता था, पैसे कमाना चाहता था और दूसरा, कुछ नया और अलग करना चाहता था। आश्रम की सुरक्षित, सुस्थिर और सरल जीवन शैली से यह 16 साल का युवा अब ऊब चुका था।

हमने उसे एक बार और ठीक तरह से सोचने का मौका दिया और जब वह अपने निर्णय पर अड़ा रहा तो उसके पिता को भी बुला लिया। फिर से हमने बात की, परन्तु अपनी बात मनवाने की कोशिश नहीं की, सिर्फ सारे विकल्प उसके सामने रखे। तुम यहाँ रहकर स्कूल में पढ़ाई कर सकते हो; बाहर निकलकर कोई काम-धंधा सीख सकते हो; या आश्रम छोड़कर जा सकते हो और स्वतंत्रता पूर्वक दुनिया देख सकते हो, उसे जाँच-परख सकते हो। उसने अंतिम विकल्प चुना।

जयसिंह के लिए आश्रम के दरवाजे हमेशा खुले हैं। अपने दैनिक जीवन में हम उसकी कमी महसूस करते रहेंगे लेकिन हम जानते हैं कि यही जीवन की चाल है और दुनिया इसी तरह चलती है: बच्चे बड़े होते ही हैं और घर छोड़कर निकल भी जाते हैं। स्वाभाविक ही, हमारे लिए यह परिस्थिति कुछ खास हो गई है। क्योंकि यह एक तरह से उसका दूसरा घर और दूसरा परिवार ही था, हम यह भी सोच रहे हैं कि शायद उसके भविष्य के लिए यहीं रहते हुए हमारी सहायता से कोई व्यवसाय सीखना अधिक अच्छा होता। लेकिन यह उसका अपना निर्णय था और यही उम्र होती है जब कोई व्यक्ति जीवन में अपने भविष्य के निर्णय लेता है।

तो, इस तरह हमारा एक बच्चा, हमारे आश्रम का एक लड़का, अपनी मर्ज़ी से अपना जीवन जीने के लिए आश्रम छोड़कर चला गया और भविष्य में दूसरों के लिए भी यही खुला नज़रिया हम बनाए रखेंगे।

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