हमारा आश्रम किस तरह लोगों में परिवर्तन लाता है-अगर वे वाकई बदलना चाहें तो! 13 मई 2014

आश्रम

कल मैंने आपको अपने दो कर्मचारियों का किस्सा बताया था, जिनसे अभी कुछ दिन पहले ही हमने बिदा ली है। जैसा कि मैंने कहा था, हमने बहुत कोशिश की कि उनमें कुछ सकारात्मक परिवर्तन आए मगर हम असफल रहे। कई बार बहुत प्रयास करने पर भी यह असंभव होता है कि उनमें कोई बदलाव आए भले ही बदलाव से उनका ही लाभ क्यों न होने वाला हो।

एक बात आपके सामने शुरू में ही स्पष्ट कर दूं: मैं कभी भी किसी को बदलने का प्रयास नहीं करता क्योंकि मुझे भी यह पसंद नहीं है कि कोई मुझे बदलने का प्रयास करे। लेकिन यह संभव होता है कि आपका व्यवहार, आपकी बातें, आपके काम और सिर्फ आपका व्यक्तित्व लोगों में परिवर्तन का कारण बन जाता है। और आश्रम में तो अक्सर हमने ऐसा होते हुए देखा है।

हमारे आश्रम में हम सब एक साथ एक परिवार की तरह रहते हैं: मेरा परिवार, बच्चे, जिन्हें हम लोग पाल-पोसकर बड़ा कर रहे हैं क्योंकि उनके माता-पिता ऐसा नहीं कर पा रहे हैं और हमारे कर्मचारी, जो यहाँ के नहीं हैं, बहुत दूर कहीं के रहने वाले हैं और इसलिए यहीं रहते हैं। इस तरह यहाँ का माहौल बहुत पारिवारिक है, विशेषकर इसलिए कि हम उनमें और हममें किसी तरह का अलगाव पैदा करना नहीं चाहते। वे सब भी वही भोजन करते हैं, जो हम करते हैं। जब हम भोजन के अतिरिक्त कोई मिठाई या कोई और खाने-पीने की चीज़ खरीदते हैं तो वह सबके लिए होती है। जब हमारे यहाँ कोई उत्सव या समारोह होता है तो उसे पूरी तरह सफल बनाने के लिए हम सब मिलजुलकर काम करते हैं और सभी को उसका उपयुक्त हिस्सा और उसमें शामिल होने का सामान अवसर प्राप्त होता है। सिवा उनके जो बहुत संकोची और शर्मीले हैं या जिनकी इन समारोहों में रुचि नहीं है, सभी नाच-गानों में शामिल होते हैं, सामूहिक रूप से केक काटा जाता है, एक स्वर में जन्मदिन के गीत गाए जाते हैं और केक सफाचट करने की सामूहिक कार्यवाही तो देखते ही बनती है!

स्वाभाविक ही, इस तरह के समाज में रहते हुए हर व्यक्ति में, थोड़ा ही सही मगर कुछ न कुछ परिवर्तन तो आता ही है और अक्सर वह सकारात्मक परिवर्तन ही होता है। हमने बहुत शर्मीली युवा महिलाओं को खुलकर नृत्य करते और उसका मज़ा लेते हुए देखा है। हमने युवकों को ख़ुशी-ख़ुशी नई ज़िम्मेदारियाँ अपने कन्धों पर लेते और उन्हें सफलतापूर्वक पूरा करते देखा है। हमने बुज़ुर्ग लोगों को युवाओं से प्रेरणा प्राप्त करते देखा है।

परिवर्तन आवश्यक और उपयोगी होते हैं। हमें हमेशा बेहतरी के लिए बदलाव की ज़रुरत होती है। अगर जीवन में परिवर्तन नहीं है तो उसमें जड़ता आ जाती है, एक तरह की सूक्ष्म मृत्यु, जहाँ कुछ भी आगे नहीं बढ़ रहा होता, जीवंत नहीं होता। मेरे पास अपना खुद का उदाहरण मौजूद है, जो अपने जीवन में न जाने कितने ही परिवर्तनों से गुज़र चुका है। इसलिए मेरा दृढ़ विश्वास है कि हर कोई अपने आप में परिवर्तन लाने में सफल हो सकता है-मगर तभी, जब उसमें बदलने थोड़ी सी इच्छा हो और परिवर्तन के उस रास्ते पर आगे बढ़ने की थोड़ी सी तत्परता हो, थोड़ा सा साहस हो!

कभी-कभी ऐसा नहीं भी हो पाता। अगर मैं कल का उदहारण लूँ तो कह सकता हूँ कि हमने उस दम्पति को अपने अन्दर परिवर्तन लाने के कई मौके दिए मगर वे परिवर्तित नहीं हुए। हमने उनसे बात करके समझाने की कोशिश की, हम उन्हें बहुत नम्र भाषा में और तरह-तरह के दबाव डालते हुए भी समझाते रहे। किसी का कोई असर नहीं हुआ और हमारे प्रयास फलीभूत नहीं हो सके। स्वाभाविक ही, वे परिवर्तन के लिए कतई तैयार नहीं थे।

हिंदी में एक कहावत है: कुत्ते की पूंछ को किसी पाइप में डालकर बारह साल भी रखें तो भी पाइप से निकालने पर वह सीधी नहीं होती!

अगर उनमें इच्छा नहीं है तो आप दूसरों को बदल नहीं सकते। किसी में परिवर्तन की आपको आशा नहीं करनी चाहिए और अगर इस दिशा में किए गए आपके प्रयत्नों को सफलता नहीं मिलती तो निराश नहीं होना चाहिए। अगर वे खुद अपने भविष्य के प्रति बेखबर हैं और उन बातों पर, जिन्हें आप उनके लिए अच्छा समझते हैं, आपसे सहमत नहीं होते तो ऐसा कोई तरीका ही नहीं है कि वे कभी बदल सकें।

आपके लिए यही उचित होगा कि ऐसे लोगों को उनके हाल पर छोड़ दें। अगर इसका अर्थ यह है कि आप एक-दूसरे के साथ नहीं चल सकते, कि आपको भौतिक रूप से एक-दूसरे का साथ छोड़ना होगा, तो ऐसा ही सही!

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