स्वाभाविक ही, हमारे योग और आयुर्वेद शिविरों में विदेशों से आने वाले अधिकांश मेहमान पर्यटक होते हैं। हम खुद भी उन्हें गाइडेड पर्यटन के लिए उनके मनपसंद स्थानों पर ले जाते हैं या अपनी टैक्सी उनके साथ भेज देते हैं, जिससे वे भारत की सुंदरता को करीब से देख सकें। यही ‘टूर गाइड’ और ‘पर्यटक’ की परिभाषा है- लेकिन फिर भी हमारा दावा है कि हम सबसे बहुत अलग हैं। भारत के आम ‘टूर गाइडों’ से बिल्कुल अलग और इसके अलावा हमारे साथ हुए अनुभवों के चलते हमारे ‘पर्यटक’ भी सिर्फ पर्यटक नहीं बल्कि उससे बढ़कर कुछ होते हैं। आज मैं आपको बताना चाहता हूँ कि यह विचार मेरे मन में कैसे आया और क्यों मैं समझता हूँ कि ऐसा ही है।
एक दिन मेरा एक करीबी मित्र एक व्यक्ति को लेकर आया और मुझसे मिलवाया। क्योंकि मेरा मित्र जानता था कि हमारे यहाँ अक्सर ऐसे मेहमान आते रहते हैं, जो ताजमहल और आगरा के आसपास के दर्शनीय स्थलों की सैर करना चाहते हैं, स्वाभाविक ही, दोस्त को लगा कि हम उसे काम दे सकते हैं क्योंकि वह अधिकृत सरकारी गाइड था।
अधिकृत होने के कारण पहले-पहल हमें उसका व्यवहार बहुत पेशेवर लगा: एक दिन की आगरा यात्रा का फिक्स्ड रेट, एक व्यक्ति का इतना, दस के समूह के लिए एक ख़ास शुल्क और ज़्यादा लोगों के लिए कुछ और-लेकिन सब कुछ फिक्स्ड! वह इतिहास, इतिहास-पुरुषों और महिलाओं या ऐतिहासिक तारीखों का जानकार और ऐतिहासिक कहानी-किस्सों से पूरी तरह वाकिफ था और ग़रज़ यह कि, जो भी आप जानना चाहें, उसकी ज़बान पर मौजूद!
मैं उसे रखने के लिए तैयार हो गया और कहा कि फिक्स्ड रेट तो ठीक है मगर आश्रम आने वाले हर मेहमान के लिए हमारी एक शर्त होगी: आपके शुल्क का भुगतान हम करेंगे और आपके साथ जाने वाले हमारे मेहमान से आप अलग से एक रुपया भी नहीं माँगेंगे।
उत्तर मिला: ओह, मैं नहीं माँगूंगा। उसकी कोई बात नहीं, लेकिन आप तो जानते ही हैं, जब आप किसी के साथ बाहर होते हैं, उन्हें जानकारी देते हुए और जो कुछ भी बन पड़ता है, उनके लिए अच्छा से अच्छा करते हुए उनकी सेवा में हर वक़्त तत्पर होते हैं तो उन्हें भी लगता है, कुछ इनामो-इकराम दे दिया जाए! सभी देते हैं कुछ न कुछ, तब ऐसी हालत में क्या किया जाए?… जी, शायद वे आपको पकड़कर आपकी जेब में जबरदस्ती पैसे ठूँस देते होंगे? है न?
निश्चित ही ऐसा नहीं होता! हमारे बहुत से मेहमान अपने एक दिनी सफर में ऐसा करके देख चुके हैं और जबकि कुछ लोग टिप देना पसंद करते हैं, ज़्यादातर लोग टिप नहीं देते क्योंकि वे कार और गाइड-शुल्क सहित पूरे पैकेज का पूरा शुल्क अदा कर चुके होते हैं! यह सिर्फ यह दर्शाता है कि आप इसकी अपेक्षा रखते हैं कि कोई आपको टिप या बख्शीश दे, अन्यथा आप अपना काम पूरी ज़िम्मेदारी से नहीं करेंगे!
मैंने उससे कहा कि हमारे आश्रम में टिप देने की प्रथा नहीं है। बल्कि, सच्चाई यह है कि हम अपने ग्राहकों से कहते हैं कि हमारे कर्मचारियों को पैसे न दें! जो अनुभव उन्हें यहाँ प्राप्त होते हैं, जो सुविधा और सेवा वे यहाँ पाते हैं, उसमें बहुत से लोगों का योगदान होता है और अगर आप मालिशकर्ता या ड्राईवर को टिप देते हैं तो रसोइये या बगीचे के मालियों को कुछ नहीं मिल पाता, अनजाने में ही सही, उनकी उपेक्षा होती है। हम समानता के समर्थक हैं और इसलिए हम समय-समय पर सभी को उनके वेतन पर बोनस भी देते हैं। हमारे उस बोनस-फंड में कोई भी अपना योगदान दे सकता है।
लेकिन मैं जानता हूँ कि सामान्य रूप से टूरिस्ट-गाइड अपने तयशुदा शुल्क के अलावा अतिरिक्त पैसों की अपेक्षा भी करते हैं- सीधे तौर पर या घुमा-फिराकर! या तो वे सीधे तौर पर माँग लेते हैं या फिर पर्यटकों को अपने दोस्तों की दुकानों पर ले जाते हैं, जहाँ दुकानदार पर्यटकों से सस्ते स्मारक-चिह्नों की ऊँची कीमत वसूल करते हैं और लाभ में से गाइडों को उनके इस अनुग्रह का अच्छा-खासा कमीशन अदा करते हैं।
कल मैं आपको बताऊँगा कि कैसे यह व्यक्ति भी उन गाइडों से कतई अलग नहीं था- और कैसे हम उन सबसे वाकई बहुत अलग हैं!
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