अपने बच्चों को मारिए मत – आप कहीं पर भी हों, कहीं के भी रहने वाले हों – 27 मई 2013

आश्रम

पिछला सप्ताह आश्रम के मेहमानों के मज़ेदार कारनामों के बयान में गुज़रा है लेकिन कुछ मेहमान ऐसे भी रहे हैं जिनके कारण हमें मुश्किल परिस्थितियों से गुज़रना पड़ा। उनमें से एक इटालियन महिला थी, एक माँ जो अपने दो साल के बच्चे के साथ आई थी। दुर्भाग्य से हमें जल्द ही पता चल गया कि अपने बच्चे की किसी भी गलती पर वह उसे मारा करती थी।

भारत में यह आम बात है कि अभिभावक अपने बच्चों को शारीरिक सजाएँ देते हैं। मैं इस बात को जानता हूँ और हमारे कुछ पारिवारिक मित्र कोशिश करते हैं कि हमारे सामने वे ऐसा न करें लेकिन वे हमेशा यह छिपा नहीं पाते कि वे अपने बच्चों कि पिटाई करते हैं। पिछवाड़े पर, हथेली पर या गालों पर झापड़ मार देना आम बात है और कई लोग यह समझते हैं कि कुछ सीखने के लिए बच्चों का मार खाना जायज़ है। मैंने घरेलू हिंसा के बारे में पहले भी लिखा है, मगर पश्चिमी समाजों में ऐसा होते हुए मैंने पहले कभी नहीं देखा था इसलिए जब हमने जाना कि वहाँ भी ऐसा होता है, कम से कम उस इटालियन परिवार में, तो हम सब स्तब्ध रह गए।

माँ दूसरे मेहमानों के साथ बतिया रही थी और वह बच्चा बोर हो रहा था और चिड़चिड़ाता हुआ बार-बार माँ से शिकायत कर रहा था। माँ ने ध्यान बंटाने के लिए उसे उसकी पानी की बोतल थमा दी लेकिन पानी की बोतल से उसका मन कैसे बहले? उसने बोतल ज़मीन पर पटक दी, जो टूट गई और सारा पानी फर्श पर बिखर गया। इससे पहले कि हम कुछ कह पाते कि कोई बात नहीं, पत्थर का फर्श है, साफ हो जाएगा, उसने ताबड़तोड़ बच्चे के कूल्हे पर हाथ जमाना शुरू कर दिया।

आप कल्पना कर सकते हैं कि उस वक़्त हमें कैसा महसूस हुआ होगा। हम लोग एक-दूसरे की आँखों में अचरज और हैरानी पढ़ते हुए ताकते रह गए कि उस महिला से कुछ कहा जाए, उसे रोका जाए कि ऐसा मत कीजिये। उसने बहुत ज़ोर से नहीं मारा था, बच्चे ने भी कोई शारीरिक पीड़ा महसूस नहीं की होगी मगर उस मार का असर हुआ था। शारीरिक रूप से तो उसे हल्का धक्का भर लगा होगा मगर मनोवैज्ञानिक चोट उसे अवश्य बहुत तीखी लगी होगी और इसीलिए यह बात हमारे सोच और शिक्षाओं के सर्वथा विरुद्ध थी।

सबसे परेशानी वाली बात यह थी कि हमारे कुछ बच्चे भी वहाँ बैठे हुए थे और हमारी तरफ विस्फारित नेत्रों से देख रहे थे। तीन-चार बच्चे पाँच से बारह साल के बीच के, जिन्हें हम बड़ी मुश्किल से यह सिखा पाए थे कि कोई भी मतभेद, कोई भी विवाद हम बिना किसी मार-पीट, झूमा-झटकी या किसी तरह की शारीरिक हिंसा के सुलझा सकते हैं।

क्या आपको यह अधिकार है कि आप मेरे घर में अपने बच्चे को चांटा मार सकते हैं, उसकी पिटाई कर सकते हैं या थप्पड़ मार सकते हैं खासकर तब जब यहाँ ऐसा करना सख्ती के साथ वर्जित है? सिर्फ इस तर्क से कि आप अपने घर पर भी ऐसा करते हैं? मैं ज़ोर देकर कहना चाहता हूँ कि आप ऐसा बिल्कुल नहीं कर सकते! मैं आपके देश में इसकी कानूनी स्थिति के बारे में नहीं जानता मगर यहाँ, भारत में किसी भी तरह की शारीरिक सज़ा (corporal punishment) गैरकानूनी है। शारीरिक सज़ा को यूनिसेफ़ ने इस प्रकार परिभाषित किया है: ‘किसी भी तरह की सज़ा जिसमें शारीरिक ताकत का इस्तेमाल किया जाता है और जिसका उद्देश्य दोषी को कुछ हद तक, भले ही बहुत कम, पीड़ा और दुख पहुंचाना या उसे विकल कर देना होता है।’

घटना इतनी तेज़ी से घटित हुई थी कि हम कुछ कह नहीं सके। बच्चा, स्वाभाविक ही, रोने लगा और उस महिला ने हमसे माफी मांगी और बच्चे का हाथ पकड़कर खींचती हुई वहाँ से ले गई। शायद उसने हमारे चेहरे के भावों को पढ़ लिया था क्योंकि बाद में उसने कभी अपने बच्चे पर हमारे सामने हाथ नहीं उठाया। हमने भी सोचा था कि अगर वह दोबारा यह हरकत करेगी तो उससे बात की जाएगी, मगर वह ज़्यादा दिन नहीं रही और निस्संदेह उसने इस बारे में ध्यान भी रखा होगा। इस तरह हमें उससे कुछ कहने की आवश्यकता नहीं पड़ी।

एक बहुत ही अजीबोगरीब एहसास, एक मुश्किल परिस्थिति। जो बचता है वह सिर्फ एक इच्छा कि दुनिया का कोई बच्चा ऐसी प्रताड़ना का भागी ना बने। अभिभावकों को बिना हिंसा, किसी भी तरह की हिंसा, के बगैर बच्चों का लालन-पालन करना सीखना चाहिए।

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