जैसे-जैसे समय गुज़रता गया और खासकर अपने अजीबोगरीब अनुभवों के बाद, जिनका ज़िक्र मैं अपने पिछले कुछ ब्लॉगों में कर चुका हूँ, हमने यह सीखा कि आने वाले मेहमानों से पहले ही साफ-साफ बता दिया जाए कि आश्रम में वे क्या अपेक्षा कर सकते हैं। हमारे यहाँ ऐसे मेहमानों की एक सूची है जिनका हम स्वागत करते हैं और दूसरी सूची ऐसे लोगों की है जिनके लिए हमारे आश्रम में कोई जगह नहीं है। हम इस बारे में वाकई बहुत स्पष्ट हैं, इसके बावजूद हमारे यहाँ एक ऐसा मेहमान आया जो हमारे लिए अनुपयुक्त अतिथि सिद्ध हुआ।
वह भारतीय मूल का एक अमरीकी था जिसने हमारे आश्रम में भ्रमण हेतु बुकिंग कराने के लिए ईमेल द्वारा संपर्क किया था। उसने अपने संक्षिप्त परिचय के दौरान बताया था कि उसके अभिभावक बहुत पहले अमरीका में बस गए थे और आश्रम में विश्रांति के बाद वह भारत स्थित अपने कुछ रिश्तेदारों से मिलने जाएगा। हमने हमेशा की तरह उसका स्वागत किया मगर यह भी स्पष्ट कर दिया कि हम लोग बिल्कुल धार्मिक नहीं हैं। उन यात्राओं में जिनमें हम एक समूह को यात्रा कराते हैं, आसपास के धार्मिक स्थानों पर या किसी मंदिर वगैरह नहीं ले जाते। समय मिले तो सहभागी स्वयं अपने खर्चे पर मंदिर या और कहीं भी जाकर पूजा आदि करने के लिए स्वतंत्र हैं मगर क्योंकि यात्रा का हमारा मुख्य उद्देश्य कुछ दूसरा ही होता है, कोई धार्मिक व्यक्ति, जो किसी तीर्थयात्रा की अपेक्षा करता है, हमारे साथ यात्रा करके निराश हो सकता है।
जब हमने यह बात उसके सामने रखी तो उसका बहुत सकारात्मक जवाब आया और हम आश्वस्त हो गए कि उसके साथ कोई समस्या पेश नहीं आएगी। उस व्यक्ति ने हमें लिखा कि उसने मेरी डायरी के बहुत से पृष्ठ पढ़े हैं और दरअसल वह खुद भी बहुत सी पारंपरिक आदतों को शक की निगाह से देखता है और सोचता है कि ऐसा क्यों है! उसके शब्दों में, हर बात पर उसके पास शंकाएँ थीं-और यह बात उसने बाद में रूबरू भी दोहराईं। वह एक गुरु की तलाश में भी रहा था और उनके गंदे व्यवहार, पैसे पर उनका ज़ोर और उनकी दुनियावी अभिरुचियों के चलते वह बुरी तरह निराश हुआ था क्योंकि वे उपदेश निर्लिप्तता का देते थे।
हमें उसके पास से बहुत से अच्छे ईमेल मिले जो प्रदर्शित करते थे कि वह भी परिवर्तन के उसी दहाने पर स्थित है जहां से मैं कुछ समय पहले ही गुज़र चुका था। हमने एक-दूसरे से कहा कि आश्रम में रूबरू मिलने के बाद हम लोग और विस्तार से बहुत सुखद बातचीत कर पाएंगे।
उसने अपनी बुकिंग कराई और आ गया। तुरंत यात्रा पर निकलना था और बातचीत करने का हमें ज़्यादा समय नहीं मिल पाया लेकिन जो भी थोड़ी सी बातचीत हम कर पाए उससे मुझे लगा कि यह व्यक्ति उतना अधार्मिक (non-religious) नहीं था जितना अपने ईमेल में उसने बताया था! अपनी एक डायरी में मैंने हमारी बातचीत के कुछ हिस्से का वर्णन किया है। इसलिए मुझे बिल्कुल आश्चर्य नहीं हुआ जब यशेंदु और दूसरे सहभागियों ने मुझे वापस आकर बताया कि वह उन्हें प्रार्थना करने के तरीके बताता था जैसे वह स्वयं कोई आध्यात्मिक गुरु हो!
यहाँ तक कि कई बार वह कहता, 'ओह, मैं जो कर रहा हूँ वह आपको अंधविश्वास लग सकता है मगर…', जिसका अर्थ यही था कि वह हमारे विचारों को अच्छी तरह से जानता था जैसा कि उसने स्वयं भी इस बात की ताईद की थी कि वह इन बातों पर मुझसे पूरी तरह सहमत है।
खैर, इस घटना से मैं यही निष्कर्ष निकाल सकता हूँ कि सिर्फ हमारा ईमानदारी से अपने बारे में बताना ही पर्याप्त नहीं है बल्कि मेहमानों पर भी यह ज़िम्मेदारी आयद होती है। आप जानते हैं कि आप हमसे क्या अपेक्षा कर सकते हैं और विचार कर सकते हैं कि आप हमारे सान्निध्य में प्रसन्नता का अनुभव कर पाएंगे या नहीं। इसलिए अपने आपसे और हमसे भी ईमानदार रहिए और यहाँ आने के बारे में निर्णय तभी लीजिये जब आप हर तरह से संतुष्ट हो जाएँ। हम आपका हर हाल में स्वागत करेंगे मगर आप अपने प्रवास का मज़ा ज़्यादा अच्छी तरह ले सकते हैं अगर हम एक दूसरे के बारे में पहले से पूरी तरह और स्पष्ट रूप से जानते हों।
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