आश्रम में व्यापक सफाई अभियान – 7 अक्टूबर 2014

जयसिंह को बिदा करने के अतिरिक्त पिछले कुछ दिनों से आश्रम में और भी बहुत कुछ चल रहा है। मेहमानों के लिहाज से नहीं। बल्कि इसके विपरीत, इन कुछ दिनों में हमारे यहाँ न तो विश्रांति शिविर में शामिल होने विदेशी यात्री आए और न ही कोई मेहमान-और हमने इस समय का उपयोग हमारे आश्रम परिसर की सफाई करने और बेकार चीजों से छुटकारा पाने में लगाया!

हम ऐसे काम तभी कर पाते हैं जब हमारे यहाँ कोई मेहमान नहीं होता क्योंकि आप समझ सकते हैं कि इतने बड़े आश्रम में न जाने कितनी चीज़ों का भंडार इकट्ठा किया जा सकता है! जब भंडार गृहों और बहुत समय सी अनदेखी अलमारियों और रैकों से चीज़ें निकल-निकलकर बाहर आईं तो हमें अपनी आँखों पर भरोसा नहीं हुआ कि ये सब, इतना सारा सामान हमारे यहाँ भरा पड़ा है! हमने सारी चीज़ें निकालकर बाहर, खुले आँगन में जमा कीं, जो एक विशाल कबाड़ी बाज़ार नज़र आने लगा और फिर उसकी छँटाई शुरू की। कौन सा सामान अभी ठीक हालत में है, किस सामान की ज़रूरत अब भी पड़ती रहती है, कौन सी चीज़ टूट गई है या खराब हो गई है और कौन सा सामान कभी इस्तेमाल में नहीं आता और हमारे लिए व्यर्थ है?

यह सोचकर आश्चर्य होता है कि कुछ सालों में ही न जाने कितना सामान इकट्ठा हो जाता है! कुछ बक्सों में तो सिर्फ फोटो भरे हुए थे, जिन्हें देखने पर न जाने कितनी पुरानी यादें ताज़ा हो गईं, जैसे वह पुराना समय लौट आया हो। स्वाभाविक ही, इन बक्सों को वैसे ही जस का तस बंद करके वापस रख दिया गया। बहुत से पुराने इलेक्ट्रोनिक सामान थे, कुछ टूट गए थे और इस खयाल से रख लिए गए थे कि शायद किसी दिन हमारा इलेक्ट्रिशियन उनकी मरम्मत कर देगा। एक पुराना पोलराइड कैमेरा, हमारा सबसे पहला वेक्यूम-क्लीनर, एक टेबल-फैन, कुछ लैंप्स और न जाने कितनी दूसरी वस्तुएँ। उसने एक-एक चीज़ को गौर से देखा, जाँचा-परखा मगर जिन वस्तुओं को बचाया न जा सके, उन्हें हटाना ही था। बहुत से स्टील के बरतन, केतलियाँ, वीडियो और आडियो टेप्स, बहुत सारी किताबें, फर्नीचर और बहुत से कपड़े-लत्ते!

ऐसी बहुत सी चीज़ों को, जो या तो टूट गई थीं या जिनकी अब हमें ज़रूरत नहीं थी, हम बेच सकते थे। बहुत से कबाड़ी हैं, जो बेकार, टूटा-फूटा, पुराना सामान खरीदते हैं: लोहा, प्लास्टिक और वह सब, जो पुनः बेचा जा सकता हो या किसी और तरह से काम में आ सकता हो। वे आपके घर आकर सब ले जाते हैं-आप उन्हें सामान दिखाइए और मोल-भाव कीजिए। जब आप दोनों किसी एक कीमत पर सहमत हो जाएँ तो वह सारा सामान उठाकर ले जाता है और आपको उनकी कीमत भी अदा करता है-कितना सुविधाजनक!

अलमारियों और रैकों से जो किताबें निकलीं, उनमें ज़्यादातर धार्मिक किताबें थीं। ऐसी किताबें, जिनकी अब हमें ज़रूरत नहीं थी क्योंकि न तो हम अब इस व्यवसाय में हैं और न ही फुरसत के समय उन्हें पढ़ने की हमारी इच्छा है। तब हमने दो या तीन लोगों को बुलाया, जो ऐसी किताबें रखने में रुचि रख सकते थे-मुख्य रूप से इसलिए कि उन्हें दुख होता कि हम ऐसी किताबें फेंकने जा रहे थे, जिनमें, उनके अनुसार पवित्र, ईश्वरीय शब्द अंकित हैं।

अंत में हमारे पास कपड़ों का ढेर भर बचा रह गया। कुछ तो पुराने थे मगर कुछ नए भी थे। वे इतने अधिक थे कि उन्हें बगीचे के लान में एक बड़ी दरी बिछाकर, उस पर थोड़ा फैलाकर रखना पड़ा। फिर हमारे कर्मचारी उनमें से बहुत से कपड़े ले गए, जिनकी उन्हें ज़रूरत थी या वे सोचते थे कि वे उनका उपयोग कर सकेंगे। उसके बाद भी ढेर सारे कपड़े बचे रह गए तो हमने कुछ मजदूर परिवारों को बुलवाया और कहा कि जो चाहें, वहाँ से उठाकर ले जाएँ।

वास्तव में, विश्वास नहीं होता कि इतना अधिक सामान भी कोई जमा कर सकता है, यह सोचकर कि भविष्य में कभी उनकी ज़रूरत पड़ सकती है। लेकिन फिर यह भी सच है कि बड़ा सुख मिलता है, जब इतना सारा सामान आप लोगों में यूँ ही बाँट देते हैं! अब हम बहुत हल्का महसूस कर रहे हैं, अचानक हमारे रैकों और अलमारियों में बहुत सी जगह हो गई है और सबसे बड़ी बात, जो लोग कोई न कोई सामान मुफ्त पा गए, उनके चेहरे की खुशी देखते ही बनती थी।

मैं आप सबसे यही गुजारिश कर सकता हूँ कि आप भी इसका एहसास कर सकते हैं: घर में इधर-उधर बेकार पड़े पुराने कबाड़ को, जिनकी अब आपको आवश्यकता नहीं है, बाहर निकालिए। किसी ज़रूरतमन्द को दे दीजिए- और इस एहसास का आनंद उठाइए!

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