मुख्य रूप से पश्चिमी (विदेशी) मेहमानों वाला एक आश्रम – 11 फरवरी 2014

आश्रम

कल मैंने आपको बताया था कि हाल ही में हमें अपने पहले हनीमून दंपति का स्वागत करने का अवसर मिला था। वे हमारे पहले भारतीय ग्राहक थे। क्यों? सामान्यतः हमें भारतीयों की बुकिंग प्राप्त क्यों नहीं होती? और क्या भविष्य में इस बारे में कोई परिवर्तन हो सकेगा? आज मैं इसी बात पर चर्चा करूंगा।

आज तक हमेशा विदेशी और कुछ एनआरआई ग्राहक ही हमारी सेवाएँ लेते रहे हैं। इनमें से एनआरआई ग्राहक तो विदेशों में पले-बढ़े और अपनी मानसिकता में भारतीय से ज़्यादा गैर-भारतीय ही कहे जाएंगे।

हमने अपने आपसे प्रश्न किया कि ऐसा क्यों है? क्यों हमारे आश्रम में ज़्यादातर सिर्फ पश्चिमी मेहमान ही होते हैं। हमें लगता रहा है कि भारतीय वह खरीदते ही नहीं, जो हम बेचते हैं।

इस बात में कुछ हद तक सच्चाई भी है: योग और आयुर्वेद विश्रांति शिविर सभी भारतीयों के लिए विशेष रुचिकर नहीं होते! वे भी जो इस विषय में रुचि रखते है, स्वास्थ्यकर दिनचर्या के चलते भारत में ही स्थित हमारे आश्रम आकर इन विश्रांति शिविरों में शामिल होना आवश्यक नहीं समझते। योग संबंधी डीवीडी या वीडियो की सहायता से या किसी स्थानीय योग शिविर में जाकर वे योग की मूलभूत जानकारियाँ हासिल कर लेते हैं। उन्हें सम्पूर्ण विश्रांति शिविर में शामिल होकर ज़्यादा कुछ सीखने की इच्छा नहीं होती। वैसे भी इन विश्रांति शिविरों को वे एक तरह की विलासिता ही समझते होंगे और उस पर पैसा खर्च करना उन्हें व्यर्थ लगता होगा।

वैसे यह खर्च का प्रश्न उतना नहीं है जितना कि जीवन-पद्धति का है। यह बात अब हमारे सामने स्पष्ट होने लगी है। हम देख रहे हैं कि भारत में भी हमारे पृष्ठों में रुचि बढ़ रही है और हमें लगता है कि जब व्यस्त और तनावपूर्ण कारपोरेट दुनिया में और उसके चलते उस जीवनचर्या में लोग ज़्यादा से ज़्यादा संख्या में प्रवेश करेंगे, जिसे पश्चिमी जीवनचर्या कहा जाता है, तब लोगों के लिए हमारे आयुर्वेद और योग विश्रांति शिविर रुचिकर साबित होंगे। वैसे भी यह पश्चिमी जीवनचर्या सारे संसार में तेज़ी के साथ अपने पाँव पसार रही है। जब लोग अपने स्वास्थ्य से ज़्यादा महत्व अपने काम और अपने कैरियर को देते हैं, जब काम, पैसे कमाना और व्यस्त रहना उनकी प्राथमिकता बन जाते हैं और जब एक दिन उन्हें एहसास होता है कि यह सब उनके जीवन में पूर्णता नहीं ला सकता तब योग विश्रांति शिविरों की उन्हें आवश्यकता प्रतीत होती है। जब वे पूरी तरह निचोड़ लिए जाएंगे, जब वे अपना काम गवां देने की चिंता में अवसादग्रस्त हो जाएंगे, जब फोन की घंटी बजते ही उन्हें हर तरह की आशंकाएँ घेर लेंगी क्योंकि उनका शरीर और मस्तिष्क उस तनाव को झेल सकने के काबिल नहीं रह जाएगा।

ऐसी जीवन-शैली में लोगों के पास अपने ही लिए समय नहीं होता। न तो जीवन का वास्तविक आनंद लेने का उनके पास समय होता है और न ही भावनात्मक रूप से वे वास्तविक जीवन से जुड़ पाते हैं। ऐसी हालत में उनके पास अपने परम्परागत ज्ञान जैसे आयुर्वेदिक उपचार पर या रोज़ योग करने के लिए भी समय नहीं होता। उन्हें पुनः सीखना पड़ता है, उन्हें अपनी विश्रांति के लिए अलग से समय निकालना होता है।

कभी-कभी हम यह भी सोचते हैं कि एक टिपिकल भारतीय हमारे आश्रम में किसी पश्चिमी मेहमान की तुलना में उतना सहज नहीं रह पाता होगा क्योंकि हमारे यहाँ रूढ़ियों और परम्पराओं से दूर एक उन्मुक्त और अनौपचारिक जीवन-शैली अपनाई जाती है।

इसलिए हो सकता है कि भविष्य में हमारे यहाँ कुछ भारतीय मेहमानों का आना भी शुरू हो जाए। यह समय ही बताएगा और सामान्य जीवन-शैली, संस्कृति और लोगों की जरूरतों में होने वाले परिवर्तनों पर हमारी पैनी नज़र बनी रहेगी।

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