हमारी सयानी अपरा को कपड़े पहनाते वक़्त कौन किसे मूर्ख बनाता है? 5 दिसंबर 2013

अपरा

मैं समझता हूँ आज पुनः आपको बताना चाहिए कि आजकल हमारी अपरा बेटी क्या कर रही है। और यह भी कि आजकल वह क्या-क्या ड्रामेबाजी सीख गई है।

जब कि गर्मियों में अपरा पूरे समय पहनने के लिए अपने मोज़े मांगा करती थी, आजकल सर्दियों में वह उन्हें देखना तक पसंद नहीं करती। यही बात जींस और गर्म स्वेटर, जैकेट और पुलोवर के बारे में भी है कि वह उनसे दूर भागती है। बल्कि आजकल वह हल्के स्वेचर्स (हल्के-फुल्के शर्ट) और पतले सूती पैंट पहनना पसंद करती है। संभव हो तो सिर्फ नाइट सूट। इससे पहले कि आप उससे कोई भी मोटा कपड़ा, कोई ऊनी पुलोवर या कुछ भी रंगीन और जींस पहनने के लिए कहें, वह साफ मना कर देती है।

यहाँ, भारत में भी कुछ माह काफी ठंड रहती है और भले ही साल के अधिकांश महीने बच्चों को खुला, अर्धनग्न घूमने-फिरने दिया जा सकता है, इस ठंड में उन्हें इस तरह खुला नहीं छोड़ा जा सकता! तो हम आजकल रोज़ ही इस बात पर चर्चा किया करते हैं कि कपड़े पहनना है या नहीं और पहनना है तो कौन से।

अपरा अपनी अप्रसन्नता व्यक्त करते हुए काफी उग्र हो जाती है। अगर आप उसे जबर्दस्ती जींस पहनाने की कोशिश करें तो वह चीखने-चिल्लाने लगती है, इधर-उधर भागने लगती है, कभी सिर इधर कर लेगी कभी पैर उधर। आपको तेज़ दौड़कर उसे पकड़ना पड़ता है, स्टूल पर बिठाना पड़ता है या अपनी बाहों में संभालकर रखना पड़ता है कि हाथ में लिया हुआ कपड़ा गिर न जाए। इसलिए आजकल हम बिस्तर पर बैठकर उसे कपड़े पहनाते हैं। भाग-दौड़ और इधर-उधर गिरने-लुढ़कने की संभावना नहीं होती, और गिर भी गई तो गद्देदार बिस्तर पर चोट नहीं लग सकती!

जींस का विकल्प जल्द ही खोज लिया गया: उसके पसंदीदा सूती पैंट में से वह कोई भी चुन सकती है और हम लोग पहले ही एक पैंट पर दूसरी पैंट की परत चढ़ाकर रखते हैं कि उसे पता न चले कि वह दो-दो पैंट एक साथ पहन रही है। इससे काम बन जाता है, उसे ठंड लगने की संभावना भी नहीं रहती और हमें उसकी चीख-पुकार, रोने-धोने और मान-मनव्वल के झंझट से मुक्ति मिल जाती है।

कभी-कभी, जब उसके सामने पांच विकल्प रखे जाएं और उसे एक को चुनने के लिए कहा जाए तो वह पुलोवर पहनने के लिए राज़ी हो जाती है। लेकिन कई बार कोई विकल्प उसे भाता नहीं है। फिर अपनी छोटी-छोटी, मासूम चालाकियों से वह हम पर हावी होने की कोशिश करती है: जब आप एक कपड़ा उसके सामने रखते हैं तो वह कहेगी, 'नहीं, काली वाली नहीं!' दूसरा रखेंगे तो कहेगी, 'वो बहुत छोटा है!' फिर किसी और के लिए कहेगी, 'बड़ा है!' किसी को कहेगी 'गंदा है!' तो किसी को कहेगी, 'गीला है!' और बड़े-बड़े तर्कों के साथ सारे विकल्पों को धराशायी कर देगी!

जब आप उससे कहते हैं कि तुम्हें ठंड लग जाएगी, फिर दवाई खानी पड़ेगी और हो सकता है डाक्टर के पास भी जाना पड़े तो कभी तो वह हमारी चाल में आकर तैयार हो जाती है और कभी गला फाड़कर रोना शुरू कर देती है और हम परेशान हो जाते हैं कि भविष्य में उसे लेकर डाक्टर के पास ले जाना और भी मुश्किल होने वाला है या बिना तमाशे के वह आगे से डाक्टर के यहाँ नहीं जाने वाली।

कभी-कभी… जी नहीं, किसी भी हालत में पुलोवर वह बिना अपनी मर्ज़ी के नहीं पहनती। इसलिए हम अब उसे पुलोवर पहनने के लिए कहते ही नहीं क्योंकि उससे रोना-धोना, चीखना-चिल्लाना ज़्यादा होता है।

जब कोई उपाय काम नहीं करता तो हम अपरा से साफ कह देते हैं कमरा गर्म है और बाहर ठंड है; बिना पुलोवर, जैकेट, मोज़े, गर्म पैंट या जो भी पसंद हो, पहनकर ही तुम बाहर निकल सकती हो। कभी इस धमकी का असर जल्दी हो जाता है और कभी थोड़ी देर लग जाती है।

हम इस बात पर खुश हैं कि हमारे पास उसके लिए हमेशा पर्याप्त समय होता है और हम उसके पास बैठे उसकी झल्लाहट समाप्त होने का इंतज़ार कर सकते हैं और अगर उसका यह नाटक ज़्यादा देर तक चलने की संभावना है तो कोई दूसरा चार्ज लेने के लिए कोई न कोई स्थानापन्न भी मौजूद होता है। गनीमत यह है कि फिलहाल वह सिर्फ कपड़े पहनने के लिए हमें इतना नचा रही है! लेकिन एक अच्छा संकेत अभी हाल में मिला है: पिछले तीन दिन से वह बिना किसी बखेड़े के अपना जैकेट पहन लेती है-शायद उसने अपना वह दौर पार कर लिया है।

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