दो ज़ू और एक समुद्र-किनारा – जर्मनी भ्रमण की कुछ झलकियाँ – 17 जून 2013

अपरा

आज फिर वह दिन आ गया है जब मुझे अपने जर्मनी प्रवास के बारे में आपको विस्तार से बताना है।

इसमें कोई शक नहीं कि इतने सारे जानवरों से रोज़-ब-रोज़ मिलना अपरा का अपनी माँ के देश में मुख्य शगल था। अपने जर्मनी प्रवास के बारे में लिखते हुए पिछले ब्लॉग में मैंने आपको बताया था कि हम सब आंद्रिया के साथ एक ज़ू देखने जाने वाले हैं। हमने ल्युनेबर्ग में भी ज़ू का भ्रमण किया था और कल म्यूनिख का ज़ू देखने भी गए। दोनों बार हमारा समय शानदार गुज़रा और अपरा तो जैसे अभिभूत ही थी!

दोनों पार्कों का निर्माण बहुत सुंदर ढंग से किया गया है। जानवरों के लिए काफी जगह है, जहां वे भाग-दौड़ और कूद-फांद कर सकते हैं और कई बार तो लगता है जैसे हम किसी छोटे-मोटे जंगल में ही घूमने आ गए हों क्योंकि पार्क के डिजाइनर ने प्राकृतिक रास्तों के दोनों ओर बहुत नैसर्गिक वातावरण निर्मित करने में बहुत मेहनत की है और बड़ी संख्या में जानवरों और पर्यटकों को लुभाने वाले तरह-तरह के पेड़ लगाए गए हैं। यह वयस्कों के लिए भी बहुत आकर्षक है। अपरा जैसे बच्चे आनंद में इधर-उधर भाग-दौड़ करते रहते हैं, कभी इस जानवर के पीछे तो कभी उस! उसके लिए अपने पसंदीदा जानवर जैसे बंदर, शेर, भालू, सूअर, हाथी, गधे और तरह-तरह के पक्षी, खरगोश आदि के अलावा कुछ दूसरे जानवर जिन्हें उसने यहाँ पहले-पहल देखा था जैसे सफ़ेद भालू, को देखना अद्भुत था। उसने बहुत मौज-मस्ती की, पूरा आनंद उठाया। वह नज़रें गड़ाकर उन्हें देखती और उनकी वास्तविक विशालता, ऊंचाई देखकर विस्मित रह जाती क्योंकि अब तक उन्हें उसने सिर्फ इंटरनेट पर ही देखा था। वह नए नए अनुभव और प्रभाव ग्रहण करती हुई हँसती, उल्लास में चीखती-चिल्लाती, खाना-पीना और सोना तक भूल गई जबकि इतनी दौड़-भाग करने के बाद वह थक जाती है और वैसे भी दोपहर में आम तौर पर वह सोती है।

मगर दोनों ही जगहों में जो चीज़ सबसे ज्यादा अच्छी लगती थीं वे थीं बकरियाँ! यह अद्भुत बात है कि इतने सारे जानवरों में यही जानवर सबसे ज्यादा आकर्षित करता था। स्वाभाविक भी था, क्योंकि हम उसे छू सकते थे, थपकियाँ दे सकते थे, उन्हें खिला सकते थे। उनके लिए अलग जगह बनाई गई थी जहां लोग उनके लिए खाने की चीज़ें खरीदकर उन्हें खिला सकें और खिलाते हुए उन्हें पुचकार सकें, थपथपा सकें। ल्युनेबर्ग में तो हमने उन्हें बहुत खिलाया-पिलाया मगर यहाँ अपरा उन सबको छूने के लिए उनके पीछे दौड़ती-भागती रही, कभी इसके पीछे तो कभी उसके। जब सभी बकरियों को वह थपथपा चुकी तो उसके मन में एक दूसरा विचार आया-वह हर एक के पास जाती और एक-एक का मुंह ताकती जिसके लिए उसे घुटनों के बल झुकना पड़ता था और ऐसा सुंदर दृश्य बनता था की देखते ही बनता था। वह उन्हें पुकारती, “ए बकरी, ए बकरी!’ बड़ा मज़ेदार था यह सब!

हम बड़े खुश हैं कि मौसम आजकल बहुत साफ है, सूरज निकला हुआ है और ठंड कम हुई है। ऐसे खुशनुमा मौसम में हम अपरा को घूमने-फिरने और नए-नए अनुभव प्राप्त करने का एक और मौका दिये बगैर नहीं रह सकते थे। तो आंद्रिया, माइकल और हम उसे लेकर बाल्टिक सागर पर एक बीच घूमने निकले। जैसे ही अपरा के पैर रेत पर पड़े, वह बहुत उत्तेजित हो उठी और बैठकर रेत से खेलने लगी। तत्काल ही वह अपने खेल में मगन हो गई और उसे हमसे कोई मतलब नहीं रहा! इतनी सी बात से बच्चे कितना खुश हो जाते हैं! फिर यशेंदु उसे पानी तक ले गया और उसे उठाकर उसके पावों को पानी में रख दिया। वह ‘छप-छप’ पैर फटकारती हुई खुशी के आवेश में चीखने-चिल्लाने लगी। बीच पर एक खास तरह का माहौल होता है जो बच्चों और युवाओं को चमत्कृत कर देता है!

आंद्रिया और माइकल के साथ हमने शानदार वक़्त गुज़ारा और फिर हम रमोना के पिता और परिवार से मिलने दक्षिणी जर्मनी में स्थित उनके शहर आ गए। यहाँ भी हमने बहुत सुखद समय बिताया और उन लोगों की तो गिनती करना ही असंभव है जिनसे हम पिछले सप्ताह मिले होंगे। ल्युनेबर्ग बीच पर रेगीना और सेलीना हमसे मिलने आईं, बहुत से मित्र खाना खाने आए और हम आंद्रिया और माइकल के माता-पिता से मिलने उनके घर गए। रमोना अपने स्कूल के मित्रों से मिलकर आई और कल हम लोग उसकी चाची और चचेरे भाई-बहनों के साथ थे। और एक कज़िन का एक नन्हा बच्चा भी था और हम सब उनके साथ ज़ू भी गए।

आप देख सकते हैं कि इन छुट्टियों में हम अपरा और उसके आसपास की दुनिया को देखते हुए आनंदमग्न और लगातार बहुत व्यस्त हैं। अब हम ट्रेन में बैठकर वीसबाडन के लिए रवाना हो चुके हैं। हमारे पास अब सिर्फ एक सप्ताह ही बचा है और उसके बाद हम वापस भारत के लिए रवाना हो जाएंगे। थॉमस और आइरिस के साथ, जो वहाँ हमसे मिलने आएंगे, एक और उल्लास और उत्तेजना से भरा सप्ताह!

जर्मनी में अपरा की फोटो यहाँ देखें

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