सुखद हवाई सफर के बाद कल हम सब सकुशल भारत और फिर आश्रम वापस लौट आए। रात का सफर था इसलिए अपरा पूरे वक़्त सोती रही और हम भी कुछ देर आँखें मूँद पाए। हमने उसे बताया था कि मेरा भाई पूर्णेंदु हमें लेने आएगा और हम आश्रम पहुँचकर सबसे मिलेंगे। हम विमान-तल का प्रांगण पार कर रहे थे और वह आश्रम के लोगों के नाम ले-लेकर और बीच-बीच में कुछ जर्मन दोस्तों के नाम जोड़कर तुकबंदियों में कुछ गुनगुनाती जा रही थी। हम विमान-तल से बाहर निकलकर जैसे ही पूर्णेन्दु से मिले वह अनिवर्चनीय खुशी से उछल पड़ी और फिर अचानक झेंप गई। मुसकुराते हुए वह उसकी गोद में चढ़ गई और बहुत खुश हुई मगर लगता था कि खुशी के अतिरेक से वह स्तब्ध रह गई थी। मगर उसकी यह हालत ज़्यादा देर नहीं रही! जल्द ही वह कार के भीतर थी और आसपास के यातायात का जायजा लेते हुए बीच-बीच में उसका बखान करती जाती थी। गायें, घोड़े, पैदल लोग, हॉर्न के कर्कश स्वर और वे सब चीज़ें जो जर्मनी में वह पिछले सवा माह देख नहीं पाई थी। एक और बात हुई, जो जर्मनी में कभी नहीं हुई थी मगर भारत में अक्सर हुआ करती थी-गाड़ी पंक्चर हो गई! इस घटना के चलते हमें आश्रम पहुँचने में कुछ देर हो गई, मगर हम अंततः आश्रम पहुँच गए।
अपरा के साथ घर लौटना बहुत सुखद था। सभी हमें मिस कर रहे थे लेकिन अपरा को सबसे ज़्यादा। वे अपरा के पास आकर उसे प्यार करने लगे, गोद में लेकर खिलाने लगे। शुरू में तो वह आश्चर्यचकित रह गई और फिर अचानक उन्हें पाकर बहुत खुश हो गई। वह एक के बाद एक सबके पास गई जैसे सुनिश्चित कर रही हो कि सारे आश्रमवासी उपस्थित हैं। फिर वह जय सिंह और मोहित के साथ शाम को पूरे समय खेलती रही। वह उन्हें देखकर खुशी से इतना उत्तेजित थी कि बार-बार जय सिंह का चेहरा अपने हाथों में लेकर उसका नाम पुकारती। उसके साथ खेलते हुए वे दोनों भी खुशी से पागल हो रहे थे। आश्रम में हर एक के सामने एक नई समस्या अवश्य पेश आई: वह यह कि अब सबको जर्मन भाषा सीखनी थी। अपरा ने बहुत ज़्यादा जर्मन शब्द सीख लिए थे और जर्मन बोलने की आदत भी उसे पड़ गई थी इसलिए कई बार उसकी बातें उन्हें समझ में नहीं आती थीं। वह अपना कहा दोहराती और जिसकी अंग्रेज़ी या हिन्दी उसे मालूम होती उन्हें अंग्रेज़ी या हिन्दी में दोबारा कहती मगर कई बार लोगों को रमोना के पास जाना पड़ता कि वह क्या कह रही है, या फिर अंदाज़ से काम चलाना पड़ता!
उसके बाद अपरा सो गई और देर तक सोती रही। मैं और रमोना जागते रहे क्योंकि भारतीय टाइम-ज़ोन में लौटने का यही तरीका हमें ठीक लगा। हमारा बच्चा अभी यह सब क्या जाने! उसने अपनी पूरी नींद ली और भारतीय समय के अनुसार सोने का उसका कोई इरादा नज़र नहीं आ रहा था। जर्मनी में उसका सोने का समय 9 बजे था और उसी वक़्त अंततः वह सोई। इस तरह हम लोग साढ़े बारह बजे सो पाए। स्वाभाविक ही हम भी उसी अनुपात में देर तक सोते रहे! यात्रा की थकान और पिछली रात नींद पूरी न होने का असर सुबह दिखाई दिया। जब हम सुबह उठे तो दस बज चुके थे। लेकिन हमें विश्वास था कि दो चार दिन में यह समय की उलझन दूर हो जाएगी।
यह बहुत बढ़िया और सुखद वापसी थी और अपरा के कारण वह और शानदार हो गई। अपरा नहीं होती तो यह निश्चय ही मेरे जीवन की सबसे दुखद वापसी होती क्योंकि मेरी माँ पहली बार हमारा स्वागत करने के लिए आश्रम में विद्यमान नहीं होतीं। निश्चय ही वहाँ भोजन था, गले लगाने के लिए मित्रों और रिश्तेदारों के कंधे थे लेकिन भोजन माँ के हाथ का नहीं था और गले लगाने के लिए उसकी बाहें नहीं थीं। वह आश्रम में नहीं थी और हमने उसे बहुत मिस किया।
लेकिन अब हम अपरा की तरफ देखते हैं और खुश हो लेते हैं। मुझे महसूस होता है कि मेरी माँ अपरा के रूप में जीवित है और पहले ग्यारह माह में उन्होंने उसे जो शिक्षा दी उसी से वह इतनी समझदार बन सकी है।
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