जर्मनी में छुट्टियाँ बिताने के बाद वापस लौटने को तैयार – 24 जून 2013

हमारे पाँच सप्ताह के जर्मनी दौरे का आज आखिरी दिन है। इससे पहले कि हम आज रात हवाई जहाज से भारत के लिए रवाना हों, अपरा की, अपनी माँ के देश, जो मेरा भी एक तरह से दूसरा घर ही बन चुका है, की पहली यात्रा का उपसंहार आपके सामने प्रस्तुत करना उचित होगा।

वीजबादेन में हमारा अंतिम सप्ताह बहुत बढ़िया रहा। न सिर्फ मौसम बहुत सुहावना और गर्म था बल्कि हमारे साथ बहुत अच्छे और मिलनसार मित्र भी थे। इसलिए जर्मनी में अपरा और हमारा अंतिम सप्ताह बहुत ही शानदार रहा। थॉमस और आइरिस के साथ उनके बगीचे में पीत्ज़ा खाते हुए और प्रकृति का आनंद उठाते हुए गर्मियों की बहुत सुंदर शाम हमने गुज़ारी। दूसरे कई मित्र भी हमसे मिलने आए जैसे लेना, जो स्विट्ज़रलैंड से आई थी और उर्ज़ुला, जिससे हम दो साल से नहीं मिल पाए थे। हम अपने मित्र ज़ेली और माइक से मिलने माइंज गए जहां ज़ेली ने हमारे लिए बहुत स्वादिष्ट भोजन पकाकर रखा था। तो यह एक और शानदार शाम थी!

इस अंतिम सप्ताह हमने भारत में इंतज़ार कर रहे अपने परिवार, मित्रों और आश्रम के बच्चों के लिए उपहारों की थोड़ी-बहुत ख़रीदारी की। और कल हमने वह किया जो थॉमस और आइरिस के साथ हम कई साल से करना चाहते थे मगर कभी मौका ही नहीं मिला था। हमने एक बोट किराए पर ली और राइन नदी में सैर को निकल पड़े। हवा चल रही थी और कुछ ठंड भी लग रही थी लेकिन सैर मौज-मस्ती से भरपूर रही। बोट में सवार होने तक अपरा सोती रही लेकिन कुछ देर बाद जाग गई और जागते ही आसपास का नज़ारा देखकर हर्ष विभोर हो उठी। चारों तरफ पानी देखकर उसका मुंह खुला का खुला रह गया और वह खुली हवा में चेहरे पर हवा के थपेड़ों का मज़ा लेने लगी। उसके लिए और हमारे लिए भी यह एक अप्रतिम अवसर था और जब हम वापस लौटकर आए अपने आमोद प्रमोद को हमने अपने-अपने प्रिय आइसक्रीम खाकर साथ सम्पन्न किया।

पूरी यात्रा में आइसक्रीम ऐसी चीज़ थी जिसका हमने बहुत मज़ा लिया। स्ट्राबेरीज़, जर्मन ब्रेड, ब्रेड रोल्ल-पता नहीं कितने तरह के आइसक्रीम थे और हम चाहते थे कि जर्मनी में रहते हुए अपरा सबका मज़ा ले। और उसे सभी आइसक्रीम पसंद आए! कल जब हम अपने इटालियन आइसक्रीम की आखिरी कलछी खा रहे थे तब उसने अपना पूरा हिस्सा खुद अपने हाथ से खाया। वह अब चम्मच पकड़ना और उसे नियंत्रित करते हुए खाना सीख गई है और थॉमस और आइरिस ने कहा भी कि वह सिर्फ सवा माह में, जब से हम यहाँ है, कितना कुछ सीख गई है।

यह सच है, जब हम यहाँ पहुंचे थे तब से वह बहुत ज़्यादा बातें करने लगी हैं, उसने बहुत सी जर्मन शब्दावली सीख ली है, उसकी समझ में अभूतपूर्व विकास हुआ है और उसके कुछ नए दाँत भी आ गए है। जिन मित्रों ने हमारे दौरे की शुरुआत में उसे देखा था और अब, जाते वक़्त भी देख रहे हैं, बता रहे हैं कि वह इस एक माह में ही काफी बड़ी-बड़ी लगने लगी है और वापस लौटने पर आश्रम के लोग यह बात ज़्यादा शिद्दत के साथ नोटिस करेंगे।

अपने दौरे को सारांश में बयान करना हो तो मैं कह सकता हूँ कि हमारा दौरा बड़ा शानदार रहा। हमने अपरा के साथ बहुत सारी मौज-मस्ती की, खूब घूमे-फिरे और उसे कई नई-नई चीज़ें दिखाई और बहुत से लोगों से उसका परिचय कराया। इसलिए बोर होने का किसी को समय ही नहीं मिला। उसने बहुत आसानी से नए माहौल के साथ तालमेल बिठाया। उसकी मस्ती खत्म ही नहीं होती थी और वह हर वक़्त उत्सुक, चैतन्य और उत्साहित बनी रहती थी, जब कि हमें यात्राएं बहुत करनी पड़ीं और कभी हम एक शहर में होते तो कभी दूसरे शहर में, जिससे लोगों से उसकी मित्रता होते ही उसे उनसे बिछड़ना पड़ता था। फिर भी, सभी मित्र उसे याद हैं और गाहे-बगाहे वह उनके नाम लेती रहती है।

अब अपरा भी घर जाने के लिए तैयार है। हमने उसे बताया है कि हम सब शाम को भारत जाने के लिए हवाई जहाज़ में बैठेंगे और वह इसका मतलब समझती है। उसने आश्रम को याद किया और बताया कि वह आश्रम में किस-किससे मिलेगी। तो, अब हम अपने जर्मनी अभियान के आखिरी पड़ाव पर हैं और जल्द ही घर पहुँच रहे हैं!

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