अपरा के बारे में कुछ लिखे अब काफी समय हो गया है और आज जब मैं उसके साथ खेल रहा था तो मुझे एहसास हुआ कि उसके बारे में फिर कुछ लिखूँ। जितना आनंद मुझे उसके बारे में लिखते हुए आता है उतना ही यह सोचकर भी आता है कि आप भी उसके बारे में पढ़कर आनंदित होंगे और इस कल्पना से भी कि कुछ सालों में ही वह खुद भी इन सब ब्लोगों को पढ़ेगी!
मैंने आपको बताया था कि अपरा का जर्मन परिवार एक सप्ताह हमारे साथ गुजारने यहाँ, आश्रम आया था। उनके साथ वह समय बड़ा शानदार रहा, सबके साथ खेलते-कूदते और बहुत से लोगों के साथ जर्मन में बातचीत करते हुए, नई कहानियाँ सुनते हुए और घूमते-फिरते, मौज-मस्ती करते हुए।
उसके नाना भी मान गए कि अपरा बहुत ही ऊर्जावान और उत्साही है। अब वह अक्सर दोपहर में नहीं सोती। बस अचानक कभी दोपहर में थक गई तो ही सोती है और हम भी आश्चर्य करते हैं कि आज कैसे सो गई। वैसे साधारणतया वह दिन भर जागती है और इधर-उधर दौड़-भाग करती रहती है! शब्दशः दिन भर दौड़ती, कूदती-फाँदती और खेलती रहती है और सबसे मुख्य बात, दिन भर बात करती रहती है। इसका लाभ यह है कि वह रात को जल्दी सो जाती है-जल्दी यानी लगभग नौ बजे रात को-और फिर रात भर गहरी नींद में सोती है, लगभग आठ बजे सबेरे तक। रात में बार-बार उठने की उसकी आदत नहीं रही मगर लेकिन यह होता था कि रात को उसे सोने में काफी वक़्त लगा करता था।
वास्तव में वह बड़ी बातूनी है, हमारी छोटी सी गुड़िया। हम मज़ाक में कहा करते थे कि इसमें आश्चर्य की कोई बात नहीं है: आखिर उसके पिता का व्यवसाय ही बात करना है! अपरा ने बात करना जल्दी ही शुरू कर दिया था और मेरी माँ हमेशा कहा करती थी कि वे उसे बहुत बात करना सिखाएँगी। हालांकि अम्माजी सिर्फ ग्यारह माह उसके साथ रहीं, मगर वे इस काम में सफल रहीं। अपरा एक मिनट चुप नहीं रह सकती! आजकल हिन्दी और जर्मन, दोनों भाषाओं में, वह इतनी लंबी-लंबी कहानियाँ सुनाने लगी है कि एक पिता के रूप में मुझे अत्यंत गर्व न हो, यह संभव ही नहीं है!
निश्चय ही वह अपनी आवाज़ और भाषा से हमें और अपने आसपास के सभी लोगों को अपनी बात पर आमादा करने की कोशिश करती है। जब वह आपके सामने खड़ी होकर दलीलें पेश करती है, समझौतों की पेशकश करती है और कभी-कभी अनुनय-विनय करती है तो उसकी बात न मानना आसान नहीं होता। लेकिन उसे चिढ़ने और चीख-पुकार मचाने से दूर रखना भी ज़रूरी होता है। मुझे लगता है कि यह बच्चों के लालन-पालन का ही एक हिस्सा है और यह देखकर हमें खुशी हो रही है कि हम इसमें भी सफल हो रहे हैं!
जो वह हमारे साथ आजमाती है वही अपने दोस्तों के साथ खेलते समय भी करती है और ज़ोर-ज़ोर से चिल्लाने के कारण, ठहाके लगाने के कारण, चीख-पुकार मचाकर या सिर्फ ऊंची आवाज़ में अपनी बात कहने के कारण शाम तक उसका गला बैठ चुका होता है।
अपरा एक अर्ध-जर्मन परफेक्शनिस्ट भी है। उसकी संतुष्टि के लिए छोटी-छोटी चीजें भी ‘जैसी होनी चाहिए’ वैसी ही उन्हें होना चाहिए, चाहे वह उसके जूतों के बंद बाँधने का तरीका हो या चाहे उसकी रंगीन पेंसिलें कैसे रखी जाएँ, यह मसला हो। आश्रम के एक कर्मचारी के चार साल के बच्चे के साथ बात करते हुए वह अचानक बहुत गुस्सा हो गई। वह उसे अपने नाम का सही उच्चारण सिखा रही थी: अ प रा!, वह बार-बार उसे समझाती और वह जवाब में कहता, अपला। यह बार-बार होता रहा और हर बार अपरा की उद्विग्नता और नाराज़ी बढ़ती जाती। आखिर उसे कहना पड़ा, ‘तुम अभी बहुत छोटे हो, तुम्हें अभी ठीक से बात करना भी नहीं आता!’
वह हमें रोज़ याद दिलाती रहती है कि हमारे पास अभी ही एक बड़ी लड़की है-लेकिन एक मजबूत इरादों वाली युवा महिला को बड़ा करने का सुख हम अभी कई साल तक लेते रहेंगे! 🙂
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