वृन्दावन से लखनऊ यात्रा का हमारा अपूर्व अनुभव – 23 दिसंबर 2013

हम अभी-अभी सप्ताहांत की छुट्टियाँ बिताकर लखनऊ से लौटे हैं। हम यानी रमोना, अपरा और मैं। दो साल लंबे अर्से से हमने भारत में इस तरह की कोई यात्रा नहीं की थी। जी हाँ, आखिरी बार जब रमोना गर्भवती थी तब हम ऐसी यात्रा पर निकले थे। यानी अपरा के साथ भारत में यह पहली ऐसी यात्रा है। जैसा कि अनुमान था, यह यात्रा शुरू से आखिर तक बेहद रोमांचक और सुखद रही!

हमने रेल का आरक्षण काफी पहले करवा लिया था क्योंकि अक्सर ट्रेनों में भीड़ होती है और ज़रा देर करने पर सीट/बर्थ मिलना मुश्किल हो जाता है। तो हमने गुरुवार, रात 10 बजे की ट्रेन का आरक्षण करा लिया। ठंड का मौसम है और ट्रेनें कई बार लेट होती रहती हैं इसलिए इंटरनेट पर ऑनलाइन चेक करके कि हमारी ट्रेन लेट नहीं है, हम निकले। इस तरह हम काफी पहले मथुरा रेलवे स्टेशन पहुँच गए कि ट्रेन पर चढ़ने में कोई दिक्कत न हो। लेकिन हम कुछ ज़्यादा ही जल्दी पहुँच गए थे क्योंकि डिस्प्ले हो रहा था कि ट्रेन 4 घंटा देर से आएगी, शायद धुंध की वजह से! रेलवे की वेबसाइट को धुंध से और खुद को लगातार अपडेट करते रहने से क्या मतलब! लेट होने के उपरान्त ट्रेन के आने का आधिकारिक समय 2 बजे रात का था लेकिन स्टेशन पर रेलवे कर्मचारी बता रहे थे कि कल वाली यही ट्रेन 6 बजे सबेरे मथुरा आई थी! अब हम क्या करें? घर वापस जाकर फिर 2 बजे आएँ और पता चले कि ट्रेन और लेट हो गई है! यहीं इंतज़ार करते रहें तो हो सकता है, आठ घंटे या उससे भी ज़्यादा इंतज़ार करना पड़े!

हम अपनी तीन दिन की छुट्टियों को इस तरह बरबाद होता नहीं देख सकते थे, लिहाजा हमने तुरंत सबेरे की फ्लाइट बुक करा ली। अपरा इस नए प्लान से खुश नहीं थी। दिन भर हम उसे बताते रहे थे कि कल हम ट्रेन से जाएंगे और अब, जब हम रेलवे स्टेशन पर खड़े हैं, सामने ट्रेनें आ-जा रही हैं और हम उनमें सवार होने की जगह अब हवाई जहाज से जाएंगे; ये भी कोई बात हुई! आखिर उसने जिद पकड़ ली कि उसे ट्रेन में बैठना है और जब हम उसे समझा रहे थे कि हमें वापस जाना होगा तो वह इस खयाल से बेहद निराश हो गई!

तो हमने यही किया। हमारे पास काफी वक़्त था और घर आकर हमने एकाध झपकी भी ले ली और एक बजे रात को दिल्ली के लिए निकले, जहां से हवाई जहाज की हमारी बुकिंग थी। दिल्ली पहुँचकर पता चला कि फ्लाइट भी दो घंटे लेट है। हम चेक-इन के लिए समय पर आ गए थे। अभी साढ़े तीन बजे थे अर्थात, जहाज़ आने तक हमें 5 घंटे एयरपोर्ट पर गुज़ारने थे!

घर में और फिर कार में सोने के बाद अपरा तरोताजा हो गई थी और खुद को एयरपोर्ट पर पाकर नए दिन की शानदार शुरुआत से पूरी तरह रोमांचित! खुशी और उत्साह में उसकी किलकारियाँ निकल रही थीं। कभी वह एक्वेरियम की तरफ भागती तो कभी एस्केलेटर को देखकर जर्मनी की याद करते हुए उछल पड़ती, "अपरा जर्मनी जा रही है!" जर्मनी में उसने हर जगह माल में एस्केलेटर देखे हुए थे और यहाँ भी उसने एस्केलेटर पर ऊपर-नीचे कई चक्कर लगाए। हमने इडली का नाश्ता किया।

हमारी हवाई यात्रा आरामदेह और सुखद रही और अपरा ने भी उसका भरपूर मज़ा लिया क्योंकि वह "चंदामामा के घर" आ गई थी। ट्रेन से चलने पर जिस समय पहुँचते उससे तीन घंटा देर से हम होटल पहुंचे।

कोई कह सकता है कि पारिवारिक छुट्टियों की यह बहुत बुरी शुरुआत थी लेकिन हमने उसका पूरा मज़ा लिया, प्लान में परिवर्तन, ट्रेन छोड़कर फ्लाइट बुक कराना, दिल्ली जाना और एयरपोर्ट पर इंतज़ार करना, सब कुछ। हमने सकारात्मक रवैया अपनाया और पक्का निर्णय किया कि हमें खुश ही होना है और किसी भी नकारात्मक स्थिति में न तो तनावग्रस्त होना है न ही झल्लाना है। और फिर अपरा तो हर हाल में खुश थी ही!

हम इस बात से भी खुश थे कि समय रहते हमने हवाई जहाज़ का टिकिट लेने का निर्णय किया क्योंकि दूसरे दिन किसी ने बताया कि जिस ट्रेन से हम लोग आने वाले थे वह नियत समय से 12 घंटे की देरी से आई थी! कुछ भी हो, हवाई यात्रा ही ठीक रही।

लखनऊ में बिताए इस लंबे सप्ताहांत के विषय में कल और उसके बाद कुछ दिन तक मैं आपको बताता रहूँगा।

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