अपनी साढ़े तीन साल की बच्ची, अपरा के बगैर पहली बार माँ और पा – 14 जुलाई 2015

शहर:
वृन्दावन
देश:
भारत

कल मैंने आपको अपरा के पहले लंबे सफर के बारे में बताया था, जिसमें हम दोनों साथ नहीं थे: तीन दिन और दो रातें- अपने चाचा और परनानी के साथ खजुराहो घूमने! उसका समय तो बड़ा शानदार गुज़रा- लेकिन हमारा क्या? माँ और पा की क्या हालत हुई?

मैंने पहले ही बताया कि जाने से पहले हमने अपरा से अच्छी तरह बात कर ली थी कि रात को उसे हमारे बगैर सोना होगा। हम जानते थे कि उसके लिए यह सबसे मुश्किल वक़्त होगा। हमने उसे समझाया कि हम वहाँ उसके साथ नहीं होंगे और वह हमारे पास तुरंत आ भी नहीं सकेगी- लेकिन वह निश्चिंत थी कि उसे कुछ नहीं होगा, कोई परेशानी नहीं होगी। हम जानते थे कि दिन में वह हमें भूली रहेगी मगर यही अपने बारे में हम नहीं कह सकते थे!

जब वे सब चले गए, हमारी अजीब हालत हो गई: साढ़े तीन साल में पहली बार अपरा हमारे साथ नहीं थी! और तब हमें समझ में आया कि वह हमारी कितनी छोटी-छोटी बातों में शामिल थी, हमारे मामूली से मामूली कामों के पीछे यही होता था कि उसे तकलीफ न पहुँचे, उसे दिक्कत न हो! आज ऑफिस में उसकी कोई छेड़-छाड़ नहीं होने वाली थी, हमारा ध्यान अपनी ओर खींचने वाला आज यहाँ नहीं था और खाना खाते समय तो ऐसी निस्तब्धता थी कि पूछो मत! लेकिन वास्तव में हम पल-पल उसकी अनुपस्थिति का एहसास कर रहे थे और बहुत छोटी-छोटी, मामूली बातें हमें उसकी याद दिलाती थीं कि हम उसे कितना मिस कर रहे हैं: वह उठ न जाए इसलिए आज भी सबेरे हम फुसफुसाहटों में बात करते रहे, जबकि… वह बिस्तर पर नहीं थी। फोन पर बात करते हुए मैं आदतन दूसरे कमरे में चला जाता था कि कहीं वह आकर कान में चीखने न लगे और मैं फोन पर कुछ सुन न पाऊँ! यह सब सहज हो जाता था मगर हर बार तुरंत अपरा का खयाल आता था कि अरे, वह तो यहाँ नहीं है!

जी हाँ, हम उसे बुरी तरह मिस कर रहे थे। मैं जानता हूँ कि बहुत से अभिभावक कहते हैं कि बच्चों से मुक्त सप्ताहांत कितना स्वच्छंद और सुखद होता है! लेकिन हम ऐसा बिल्कुल महसूस नहीं करते। मेरे विचार में इसका मुख्य कारण यह है कि उसके होते हुए भी हम किसी चीज़ से वंचित नहीं रहते। जो हम करना चाहते हैं, सब कुछ उसकी उपस्थिति में भी करते हैं और उसके साथ हम हर बात का आनंद लेते हैं! ऐसी कोई बात हमारे साथ नहीं होती कि वह चली गई है इसलिए ‘अब मौका मिला है, इसे निपटा लें’!

स्वाभाविक ही, पहले दिन रात को उसे रोता देखकर हम दुखी हुए थे लेकिन उससे अधिक हमें गर्व हो रहा था कि इतनी सी उम्र में वह हमारे बगैर बाहर चली गई और हालांकि शुरू में थोड़ा बिसूर रही थी लेकिन बाद में ठीक से सो गई और दूसरी रात तो हमें उतना मिस भी नहीं किया और बिना रोए सो गई। और अब वह आ गई है- रोमांचित, उत्साह से भरी और वहाँ की हर बात बताने के लिए बेताब!

इस यात्रा में उसने कितना कुछ सीखा! उसे दूरी की अवधारणा का बेहतर ज्ञान हुआ और वह यह समझने लगी कि कार में लंबे समय तक सफर करने पर पर शाम को मर्ज़ी होने पर आप माँ और पा के पास तुरत-फुरत नहीं पहुँच सकते। उसने सीखा कि कुछ पल आसपास चाचा न हो तो और किसी को पुकारकर मदद ली जा सकती है। उसने यह भी जाना कि बिना किसी को बताए कहीं भी नहीं चल देना चाहिए…और हर माता-पिता मानेंगे कि यह जीवन का बहुत बहुमूल्य पाठ उसने पढ़ा! इसके अलावा उसने हजारों छोटी-छोटी बातें सीखी होंगी, जिन्हें आप तब सिर्फ अनुभव करते हैं, जब घर पर नहीं होते।

मेरे विचार में जैसी स्वतन्त्रता मैं अपनी बेटी को देना चाहता हूँ, उस ओर उसका यह पहला कदम है। मैं चाहता हूँ कि वह जाने कि कुछ भी हो, हम हमेशा उसके साथ हैं, जब भी उसकी इच्छा हो, लौटकर अपने सुरक्षित स्वर्ग में आ सकती है। एक भरोसेमंद आसरा- लेकिन सिर्फ इसलिए कि वह भरोसेमंद है, यह आसरा पाँव की बेड़ी नहीं बनेगा। उसे बाहर निकलकर दुनिया को करीब से देखने की आज़ादी मिलनी चाहिए। इस यात्रा के रोमांच को और उससे प्राप्त नए अनुभवों के रोमांच को उसे सदा बरकरार रखना रखना चाहिए। इस तरह, मेरा विश्वास है कि वह दुनिया के बारे में उससे कहीं अधिक जान सकेगी, जितना हम आश्रम में बैठकर उसे बता सकते हैं! निश्चित ही, हम भी उसके साथ यात्राओं पर जाएँगे, लेकिन एक दिन ऐसा भी आएगा जब वह अपने चाचाओं के साथ ही नहीं, खुद अकेली घूमेगी-फिरेगी।

मैं जानता हूँ कि उस दिन मुझे गर्व का अनुभव होगा- और यह भी जानता हूँ कि मैं उसे बहुत मिस करूँगा!