मैं पहले ही आपको बता चुका हूँ कि हम अपरा से बहुत बातें करते हैं। उसने बहुत जल्दी बोलना शुरू कर दिया था और हमेशा से वह बहुत समझदार रही है और जो कुछ भी उसे बताया जाता है, तुरंत समझ जाती है। शुरू से हमने सोचा था कि अपने आसपास घटित होने वाली हर बात उसे अच्छी तरह समझाएँगे लेकिन उसकी तीक्ष्ण बुद्धि को देखते हुए हम उसे और अधिक उत्साह से सारी बातें बताते हैं। और मृत्यु की जिज्ञासा भी उसमें शामिल है- जो काफी समय पहले ही उसके साथ हमारी चर्चा में शामिल हो चुकी है।
आप जानते ही हैं कि जब अपरा सिर्फ ग्यारह माह की थी तब मेरी माँ अचानक चल बसीं। हमारे लिए आज भी वे कुछ माह बहुत मूल्यवान हैं, जब अपरा अपनी दादी के साथ समय बिताया करती थी। बब्बाजी के कमरे में अम्माजी के साथ उसके बड़े-बड़े चित्र लगे हुए हैं और एक दिन उन्हें देखकर अपरा ने पूछा: 'अम्माजी कहाँ हैं?'
भारत में ज़्यादातर लोग इसका उत्तर इस तरह देते हैं: 'वह भगवान के पास चली गई हैं' या 'भगवान उसे अपने साथ ले गए' आदि, आदि। अपने यूरोपियन मित्रों से मैंने सुना है कि वहाँ भी ऐसी स्थिति में अक्सर इसी तरह के जुमलों का इस्तेमाल होता है, उनके द्वारा भी, जो वैसे धार्मिक नहीं है, ईसाई चर्च के औपचारिक सदस्य भर हैं, साल में एकाध बार चर्च जाते हैं और ईश्वर पर भी कोई आस्था नहीं रखते। वे समझते हैं कि मृत्यु की वास्तविकता को समझाने का इससे आसान तरीका दूसरा नहीं है।
स्वाभाविक ही, हमारे पास यह विकल्प उपलब्ध नहीं था। मैं कई बार सोचता हूँ कि क्या इस तरह के उत्तरों का उल्टा असर नहीं होता होगा! धार्मिक लोग यह तो नहीं चाहते होंगे कि बच्चा भगवान पर नाराज़ हो कि उसने दादी को उसके साथ खेलने के लिए नहीं छोड़ा, बल्कि अपने साथ अपने घर ले गया! दरअसल वह तो बड़ा निर्दयी जान पड़ता है! भगवान आपके प्रियकरों को आपसे छीनकर ले जाता है और आप बाद में कभी उससे मिल भी नहीं सकते! ऐसे तो बच्चे हमेशा-हमेशा के लिए भगवान से डर जाते होंगे!
इसीलिए हम अपरा को यही बताते हैं कि हर कोई धीरे-धीरे बूढ़ा होता है और समय आने पर मर जाता है। उसके बाद वे लोग कभी वापस नहीं आ सकते। यह दुखद है मगर ऐसा ही होता है। इसी तरह जानवर भी मरते हैं और पेड़-पौधे भी। फूलों के साथ ऐसा होता हुआ उसने देखा है, उसने जानवरों की कहानियाँ सुनी हैं और यह समझ चुकी है कि उसकी दादी यानी मेरी माँ मर चुकी है और कभी लौटकर नहीं आएगी।
वास्तव में वह इसे अच्छी तरह समझती है। दूसरी बात जो उसने समझी है, वह यह है कि मेरी नानी जी भी अब बहुत बूढ़ी हो चुकी हैं। पहले भी वह यह जानती थी लेकिन अब इस तथ्य के साथ एक दूसरा पहलू भी जुड़ गया था! इसलिए एक दिन वह नानी जी के पास गई और उनसे पूछा: 'क्या आप बूढ़ी हो चुकी हो?' और जब नानी जी ने सहमति जताई तो तुरंत उसने यह प्रश्न जड़ दिया: 'तो क्या आप भी जल्दी ही मर जाओगी?'
गज़ब! मेरी नानी निश्चित ही सोच रही होंगी कि न जाने इसके दिमाग में ऐसे विचार कहाँ से आते होंगे, लेकिन उन्होंने इससे भी सहमति जताई और कहा: 'हाँ, शायद मैं जल्दी ही मर जाऊँगी लेकिन कब, कोई नहीं जानता।'
मुझे लगता है कि जब भी ऐसा दुखद दिन आएगा, मेरी बेटी, अपरा भरसक पहले से तैयार होगी। कम से कम उसकी हालत उससे बेहतर होगी जब किसी कारण हमने इस प्रश्न से किनारा किया होता या उसकी जिज्ञासा का उत्तर ठीक तरह से समझाकर नहीं बताया होता। मृत्यु जीवन का एक हिस्सा है, कडुवी सचाई है और भले ही जब अपना कोई स्नेही जुदा होता है तो दुःख तो होता ही है लेकिन इस बात को स्वीकार करना ही पड़ता है। और उसके लिए पहले से तैयार होना कितनी अच्छी बात है?
अपरा इस मामले में ठीक राह पर है। उसने नानी जी के कथन पर सहमति में सिर हिलाया लेकिन उसके बाद अपनी बात इस लहजे में कही, जैसे वह भी हकीकत जानती हो: 'हाँ, लेकिन हम सब आपको मिस करेंगे। मुझे बहुत रोना आएगा।'
नानी जी ने जवाब दिया: 'बिल्कुल! ज़रूर रोना आएगा!' और एक अजीब सी ख़ुशी से भर उठीं!
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