आखिर यह शुरू कैसे होता है – अपनी 3 साला बच्ची के साथ यौन शिक्षा – 31 मार्च 2015

मैंने आपको बताया था कि कैसे कल मैं और अपरा गले लग-लगकर यूँ ही समय बिता रहे थे कि खेल-खेल में उसने वह बड़ा महत्वपूर्ण प्रश्न पूछ लिया था। हम अक्सर इस तरह समय बिताते हैं और हमें इसमें आनंद प्राप्त होता है। बातों से ज़्यादा मैं उसके विकसित होते विचारों को सुनना पसंद करता हूँ-और आज मैं आपके साथ एक और बात साझा करने जा रहा हूँ: जब अपरा ने पूछा कि माँ के पेट में वह कैसे आ गई!

यह हमारी पसंदीदा कहानी है और अपरा भी उसे सुनकर हर बार खुश होती है कि एक समय वह रमोना के पेट में थी। हम उसे बताते हैं कि पहले वह बहुत छोटी सी थी और फिर धीरे-धीरे बढ़ती चली गई, बढ़ती चली गई। हम जर्मनी से भारत लौटने लगे तब माँ का पेट बड़ा होता जा रहा था और जब वह काफी बड़ा हो गया, हम उसे लेकर अम्माजी के साथ अस्पताल गए। हम उन बेशकीमती लम्हों के बारे में उसे बताते हैं कि अस्पताल में जब डॉक्टर उसे बाहर निकाल रहे थे, मैं माँ का हाथ हाथों में लिए वहीं खड़ा था और जब वह बाहर आई तो सबसे पहले उसे गोद में भर कर प्यार करने वाला मैं ही था।

लगभग एक साल की उम्र से उसे सारांश में या विस्तार से यह कहानी हम सुनाते आ रहे हैं। अब उसे अच्छी तरह पता है कि वह कभी माँ के पेट में थी और किसी डॉक्टर ने उसे बाहर निकाला था। लेकिन जैसे-जैसे वह बड़ी होती जा रही है, उसके विचारों में पंख फूटने लगे हैं और फिर एक दिन उसने पूछा:

"पा, माँ के पेट में मुझे किसने डाला था?"

इसका जवाब आसान था! "मैंने!" अपनी उपलब्धि पर गौरवान्वित होते हुए मैंने कहा। हमेशा की तरह उसने अगला प्रश्न दागा:

"कैसे? वहाँ आपने मुझे कैसे रखा?" ओह, ओह… लेकिन सौभाग्य से उसके दिमाग में इसका जवाब भी घूम रहा था, उसने जोड़ा: "हाथ से?"

उसने मेरी समस्या आसान कर दी थी: "हाँ, हाथों से!" – अन्यथा इस सवाल का जवाब देते हुए मेरे पसीने छूट जाते! वह इस जवाब से तो संतुष्ट हो गई लेकिन मैं साफ देख रहा था कि उसका दिमाग उड़ान भरते हुए और आगे निकल गया है:

"तो बब्बाजी ने आपको अम्माजी के पेट में रखा होगा?"

मैंने कहा "हाँ", आप कल्पना नहीं कर सकते कि यह चर्चा कितनी सम्मोहक थी, कि वह उन सारे रहस्यमय बिन्दुओं को जोड़ पा रही थी, यह समझ पा रही थी कि उसकी उत्पत्ति में मेरा योगदान रहा है, कि मैंने उसे माँ के पेट में रखा था! यह एक सहज, सरल समझाइश थी, जिसे समझना उसके लिए आसान था- और इस अवधारणा को वह अपनी दादी और अपने दादा पर भी लागू कर पा रही थी!

कल थॉमस ने उसे मछलियों की कहानी सुनाई। उसमें एक माँ मछली थी, एक पा मछली थी और छोटी सी एक बच्चा मछली थी। इस पर अपरा को अपनी कहानी याद आ गई और उसने थॉमस को बताया कि कैसे वह पहले बहुत छोटी सी थी और कैसे मैंने उसे माँ के पेट में रखा था!

महज तीन साल और तीन माह की उम्र में हमारी बेटी को इस बात का मूलभूत ज्ञान हो चुका है कि बच्चे इस दुनिया में कैसे आते हैं। रोज़ ही यह देखकर हम दंग रह जाते हैं कि बच्चों का दिमाग कितना तेज़ दौड़ता है और हमारी नन्ही बच्ची का दिमाग भी प्राकृतिक रूप से विकसित हो रहा है!

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