हमें जर्मनी आए अब लगभग तीन सप्ताह हो गए हैं और स्वाभाविक ही यहाँ का हमारा अनुभव बहुत ही अलग रहा! मैं सोचता हूँ आप हमारे अब तक के अनुभवों के बारे में जानना चाहेंगे।
सर्वप्रथम वह बात, जिससे अक्सर लोग अपना वार्तालाप शुरू करते हैं, यानी मौसम! जब हम यहाँ पहुंचे थे, फ्रेंकफ़र्ट में तापमान 7 अंश सेन्टीग्रेड था। घर जाने से पहले हमने सूटकेस में से अपने मोज़े और जैकेट्स निकाल लिए थे, जिससे कार में हम सर्दी से बच सकें। कल एक कार्यक्रम से हम लौट रहे थे और तापमान था 37 अंश! इस बीच हमें सूरज से चमकते कुछ उजले दिन मिले तो कुछ दिन बारिश होती रही, आसमान में बादल छाए रहे और ठंडी हवाएँ चलती रहीं। यह जर्मनी है-यहाँ का बावला मौसम अब हमें पहले की तरह विस्मित नहीं करता!
वीज़्बाडेन में कुछ दिन व्यतीत करने के बाद हम दक्षिण की तरफ निकल गए, जहाँ हमने अपना पहला कार्यक्रम डिशन में अमर्ज़ी नामक एक सुंदर बवेरियन झील के किनारे प्रस्तुत किया, जहाँ से आल्प्स का अद्भुत दृश्य नज़र आता है। उसके बाद म्यूनिख और औस्बर्ग में हम कुछ समय रमोना के परिवार के साथ मिलते-जुलते रहे। उनके साथ कुछ दिन बेहद शानदार और सुखद समय बिताने के बाद हम वापस वीज़्बाडेन आ गए और फिर पिछला सप्ताह वहाँ से 150 किलोमीटर दक्षिण-पश्चिम में स्थित सारलैंड में व्यतीत किया। इस तरह अपने सफर का काफी हिस्सा हमने इस बीच पूरा कर लिया है और आज रात हम अपने अगले सफर पर रवाना होंगे: आज शाम हमें स्पेन के लिए उड़ान भरनी है, ग्रान कनारिया की ओर!
इस रास्ते में हम पहले भी अपने बहुत से मित्रों और पारिवारिक सदस्यों से मिल चुके थे और उनसे फोन और इन्टरनेट द्वारा संपर्क भी बना हुआ था मगर अब उन सभी से पुनः रूबरू मिलना अद्भुत अनुभव था! हम हँसे, मौज-मस्ती की, साथ मिलकर खाना पकाया और कुल मिलाकर उनके साथ बहुत सुखद समय व्यतीत किया। सभी यह देखने को उत्सुक थे कि पिछली बार की तुलना में अपरा में क्या-क्या परिवर्तन आया है: वह कितनी बड़ी हुई है, उसने इस बीच क्या-क्या नया सीखा, आदि, आदि।
सबसे बड़ी बात यह है कि वह अच्छी-खासी जर्मन बोलने लगी है बल्कि कहना चाहिए कि वह बड़ी निपुणता और आत्मविश्वास के साथ जर्मन भाषा में बात करने लगी है! रमोना उसके साथ हमेशा जर्मन में ही बात करती है लिहाजा हम यह तो जानते थे कि यहाँ भी वह सब कुछ समझ रही होगी भले ही जर्मन में बात ना करे। शुरू में बातें तो वह बहुत करती थी मगर ज़्यादातर हिंदी में ही। लेकिन यहाँ पहले हफ्ते में ही न सिर्फ वह हमारे बहुत सारे जर्मन मित्रों से मिली बल्कि उसे कई जर्मन बच्चों के साथ खेलने का मौका भी मिला और अचानक वह सबके साथ जर्मन में बातचीत करती नज़र आई!
अब वह इतनी अच्छी जर्मन बोलने लगी है कि मैं भी बहुत से जर्मन शब्द उससे सीख रहा हूँ और उसके साथ बात करते हुए मुझे कई बार रमोना से कुछ शब्दों के अर्थ पूछने पड़ते हैं। कई बार रमोना भी आश्चर्य में पड़ जाती है- आजकल अक्सर यह प्रश्न उससे सुनने को मिलता है: "अरे, यह शब्द उसने कहाँ से सीख लिया?"!
मेरा विश्वास है कि आश्रम में रहते हुए अपरा को जो माहौल प्राप्त होता है उससे उसे यह लाभ होता है कि सफर में उसे कोई परेशानी नहीं होती: वह पहले ही तरह-तरह के चेहरे देखने की इतनी अभ्यस्त होती है कि किसी भी नई जगह में वह आसपास मौजूद विभिन्न लोगों के साथ आसानी के साथ तालमेल बिठा लेती है। हालांकि शुरू में, स्वाभाविक ही, थोड़ा शरमाती है मगर अक्सर एकाध घंटे में ही वह खुशी-खुशी नए मित्र बना लेती है भले ही वह व्यक्ति उसके लिए कितना भी अनजान क्यों न हो, सिर्फ उसे "माँ या पा" का मित्र भर होना चाहिए। फिर वह उनके साथ मैदान में खेलने चली जाएगी या बाज़ार, ख़रीदारी करने भी। हाँ, अगर उस व्यक्ति के पास कुत्ता भी है तो फिर दोस्ती और जल्दी हो जाती है!
चलें, देखते हैं, ग्रान कनारिया पहुँचने पर क्या-क्या अनुभव प्राप्त होते हैं। वहाँ हमारी मित्र बैटी हमारा स्वागत करेगी और अगले तीन सप्ताह हम लोग कई कार्यक्रमों में व्यस्त रहेंगे। हम वहाँ पहुँचने की उत्सुकता से प्रतीक्षा कर रहे हैं- निश्चय ही हम वहाँ काम के सिलसिले में जा रहे हैं मगर अपरा को समुद्र की मचलती लहरों के साथ खेलते और रेत पर घरौंदे बनाते देखना भी बड़ा रोचक और आह्लादकारी अनुभव होगा!
अपनी इस यात्रा और वहाँ के प्रथम अनुभवों के बारे में मैं आपको कल बताऊंगा!
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