हर साल उत्तरोत्तर अधिक मौज-मस्ती – अपरा का होली समारोह – 5 मार्च 2015

शहर:
वृन्दावन
देश:
भारत

मैं पहले ही आपको बता चुका हूँ कि वृन्दावन में होली की शुरुआत हो चुकी है। और अपरा इस समारोह के केंद्र में है! उसे बड़ा मज़ा आ रहा है-और हमें उससे भी ज़्यादा!

महीनों से नहीं तो भी कई हफ्तों से वह होली समारोह का इंतज़ार कर रही थी। पिछले कुछ हफ्तों से उसका जोशोखरोश बढ़ता ही जा रहा है। वह लोकप्रिय होली-गीतों के वीडियो देख रही है, उन पर नाच रही है और हमें अक्सर बताती रहती है कि कैसे वह होली के दिन हम सबको रंगों से सराबोर कर देगी।

और आखिर होली का दिन आ ही गया! जब मैं अपरा को होली खेलता देखता हूँ तो मैं भी अपने बचपन की स्मृतियों में डूब जाता हूँ। जब मैंने अपने भाइयों से पूछा तो पता चला, वे भी ऐसा ही महसूस करते हैं। पिछले हफ्ते एक दिन सबेरे उठते ही अपरा ने पूछा, "आज होली है?" और जब हमने बताया कि तीन दिन बाद है तो उसने प्रश्न दाग दिया: "क्या तीन दिन बाद, आज नहीं है?" होली के पहले दिन शाम को अचानक उसके मन में क्या आया कि वह परेशान सी मेरे पास आई और दुखी स्वर में पूछा: "अब होली खतम हो गई क्या?"

मुझे भी अपने बचपन की याद आती है जब सबेरे उठते ही हम सड़क पर निकल पड़ते थे और होली खेलने लगते थे! हमारा घर मुख्य मंदिर के पास ही था, जहाँ हर वक़्त भीड़-भाड़ रहा करती थी, हर तरफ रंग-गुलाल होता था और हर वक़्त कोई न कोई होता था, जिस पर हम रंग डाल सकते थे या उस पर गुलाल फेंक सकते थे। हम सारा दिन बाहर सड़क पर होली खेलते हुए गुज़ार देते थे और सिर्फ खाना खाने घर वापस आते थे।

रात को, जब हम सोते थे तो अपनी पिचकारी हाथों में लिए ही सो जाते थे। रात भर के लिए भी उससे अलग होना हमें गवारा नहीं होता था!

वृन्दावन में होली कई दिन मनाई जाती है और होली के पहले ही दिन से ही अपरा रंगों से खेल रही थी! सड़क के नज़दीक जाकर पहले वह गुलाल से होली खेलती रही। दूसरे दिन हमारे आश्रम में कई तरह के रंगों के युद्ध का खेल खेला जा रहा था-और न सिर्फ अपरा और दूसरे लड़के बल्कि रमोना, यशेंदु और मैं भी रंगों में सराबोर हो गए थे। उसके अगले दिन हमने सोचा उसकी पिचकारी पहली बार रंगीन गरम पानी से भर दी जाए-और उससे मौज-मस्ती में और इजाफा हो गया! कल उसका चाचा पूर्णेन्दु वापस आया और हमारे साथ होली के खेल में शामिल हो गया। इसके अलावा बहुत से मेहमान तो थे ही। मैं तो आज की रंगीन धींगा-मस्ती और आमोद-प्रमोद का इंतज़ार कर रहा हूँ और उसके बाद कल तो इस हुड़दंग और मौज-मस्ती का चरमोत्कर्ष होना ही है!

मुझे यह भी याद आया कि जब होली -समारोह का समापन हो जाता था तो हम किस कदर दुखी हो जाते थे-लेकिन, फिलहाल, दुखी तब होंगे जब वह समय आएगा! अभी तो अपनी सलोनी बच्ची को लेकर अपने आपको रंगों में झोंक देने का समय है, होली की शुरुआत है! अब वह इतनी बड़ी हो गई है कि खुद अपने दोस्त ढूँढ़कर उनके साथ होली खेलती है! इस होली में वह त्यौहार को बेहतर समझने लगी है और हर साल यह आनंद बढ़ते ही चले जाना है!

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