आउसबर्ग में आनंद-मंगल – जर्मनी में हमारे दूसरे सप्ताह की रपट – 31 मई 2013

अपरा

हमने पिछला सप्ताह आउसबर्ग में अपरा के नाना-नानी के साथ बिताया. शनिवार को हमने अपरा के साथ पहली रेल-यात्रा की और हम यह देखने के लिए उत्सुक थे कि क्या तीन घंटे की यह यात्रा भी उतनी ही आसानी के साथ पूरी हो जाएगी जैसे हवाई जहाज़ की यात्रा मज़े में पूरी हो गई थी. वैसा ही हुआ.

दरअसल, अपरा रेलवे स्टेशन जाते समय कार में ही सो गई थी. रेल में भी शुरू में लगभग एक घंटा वह सोती ही रही और उसके बाद चलती गाड़ी में ही अपनी आँखें खोली. वह खिड़की के बाहर गुज़रते नजारों को अचम्भे के साथ देखती रही और जो भी देखती उसके बारे में खोद-खोदकर पूछती जाती. अपनी फितरत के मुताबिक वह बहुत खिलंदड़े मूड में थी और जल्द ही ट्रेन में इधर-उधर घूमने के लिए मचलने लगी. हमने उसे फर्श पर खड़ा कर दिया और उसके चेहरे की बदलती रंगत देखने लगे. भागती ट्रेन में उसे स्थिर खड़े रहने में दिक्कत हो रही थी और उसे हँसी आ रही थी. फिर अपनी उत्सुकता और उत्तेजना में वह ट्रेन का मुआयना करने लगी और सहयात्रियों के साथ भी उसका राबिता कायम हो गया.

हर तरफ आनंद ही आनंद फ़ैल गया जब हम आउसबर्ग और फिर उसके नाना-नानी के घर पहुंचे. अपेक्षानुसार वह उन्हें पहचान गई क्योंकि स्काईप पर वह उन्हें हर हफ्ते देखती ही थी और इसलिए उनके सामने शर्माने की भी ज़रुरत नहीं थी. इसके विपरीत वह तुरंत सारे फ्लैट में घूम-फिर आई और जल्द ही खिलौनों का डब्बा और किताबें भी ढूंढ निकालीं, जो वैसे भी बैठक में उसका इंतज़ार कर रहे थे.

दुर्भाग्य से जैसा हम चाहते थे, मौसम उतना अच्छा नहीं था और उसे सारा दिन खिलौनों के साथ ही बिताना पड़ा. यहाँ पूरे सप्ताह बारिश होती रही और ठंडी हवाएं चलती रहीं. सिर्फ मंगलवार और कल ही हम थोडा सा बाहर निकल पाए. जब यह संभव हुआ तो अपरा पुनः एक नई उत्तेजना से भर उठी.

हम एक झील देखने गए जहाँ बहुत सारे बत्तख और हंस थे और जब हमने उनके लिए लाए ब्रेड के टुकड़े बाहर निकाले तो वे सब व्यग्रता के साथ पास आ गए और जो भी हम उनकी तरफ फेंकते, तुरंत चट कर जाते. अपरा को स्वाभाविक ही इसमें बहुत मजा आ रहा था और वह अपना गेंद फेंकने का पूरा हुनर ब्रेड के टुकड़े फेंकने में लगा रही थी. ब्रेड के हलके छोटे टुकड़े बत्तखों को छूते तो वह ख़ुशी से खिलखिला उठती. कुछ देर के बाद उसे लगा कि बत्तखों को सारी की सारी ब्रेड दे देना ठीक नहीं है इसलिए वह खुद भी कुछ टुकड़े खा गई. इतनी आकर्षक बत्तखों और विशालकाय हंसों के साथ बिताया वह समय हमें सदा याद रहेगा.

झील के पास ही एक खेल का मैदान था जहाँ हमने अपरा के साथ झूला झूलने का आनंद लिया. हम घसरपट्टी (फिसलपट्टी) पर फिसले और सी-सॉ पर खेलते रहे. देखें, अगर मौसम कुछ ठीक होता है तो अगली बार हम पानी में भी उतर पाएंगे.

अपने इलाके में जहाँ उसका बचपन बीता था, रमोना अपने लोगों के आकर्षण का केंद्र बन गई. पुराने मित्रों से भेंट हुई और एक स्थानीय अखबार, जो उसके बारे में एक आलेख भी प्रकाशित करना चाहता है, को उसने साक्षात्कार भी दिया. साक्षात्कार आज के अख़बार में है और अगर आप जर्मन समझते हैं तो उसे यहाँ पढ़ सकते हैं.

इस वक़्त हम एर्केलेंज़ जाने वाली ट्रेन में बैठे हैं. एर्केलेंज़ में हम अपने बहुत पुराने मित्र सोन्या और उसके परिवार के साथ रहेंगे. वहां फिर से यशेंदु के साथ हमारी मुलाकात होगी. हम आशा करते हैं वहां का मौसम यहाँ से कुछ बेहतर होगा. न भी हो तो घर में ही बहुत सी उत्साहवर्धक और उत्तेजक बाते होंगी जिनका हम भरपूर आनंद उठाएंगे. सोन्या और उसके परिवार में बिल्लियाँ पाली गई हैं! हमने अपरा को उनके बारे में बताया और वह अभी से उन्हें थपथपाने और उनके साथ खेलने के लिए बेचैन हो रही है. आसपास बिल्लियों का होना भी आनंददायक होता है और पहली बार अपरा उनके इतने करीब होगी!

Leave a Comment