अलग-अलग बिस्तरों पर चार रातें – अपरा को सफ़र में बड़ा मज़ा आता है! 14 जुलाई 2014

अपरा

हम फिर सफ़र पर निकल चुके हैं। वास्तव में हम लोग पिछले तीन दिनों से सफ़र कर रहे हैं! इस वक़्त, जबकि मैं ये पंक्तियाँ लिख रहा हूँ, हम लोग कैमनित्ज़ के रास्ते पर हैं और मैं अपरा के सोने का लाभ उठाते हुए यह लिख पा रहा हूँ। वह अपनी बच्चा-गाड़ी में लेटी गहरी नींद में है और शायद ट्रेनों और यात्राओं के सपने देख रही है और मैं, रमोना और यशेंदु रह-रहकर उसकी तरफ देख पड़ते हैं और उसी के बारे में चर्चा कर रहे हैं कि कैसे इस पूरी यात्रा में भी अपरा ने नई से नई चीजें सीखने और नई जानकारियाँ प्राप्त करने में कोई कसर नहीं छोड़ी है!

जब हम ग्रान कनारिया से वापस लौटे तो सबसे पहले हमने एर्केलेंज में कुछ दिन सोन्या और उसके परिवार के साथ गुज़ारे, जो हमारे बहुत पुराने मित्र हैं। उनसे एक साल बाद पुनः मिलना अपरा के लिए बड़ा अद्भुत अनुभव था। हालाँकि उसे अपनी पिछली मुलाक़ात का कुछ भी याद नहीं है लेकिन हम उसे अक्सर यहाँ के फोटो दिखाकर उनके बारे में बताते रहे थे इसलिए स्मृति तो बनी ही हुई थी और जब उसने सोन्या को देखा तो बड़ी खुश हुई! उससे अधिक तब जब उसे कारोलीन और उनकी तीन बिल्लियों के साथ खेलने का मौका मिला!

उसके बाद हम वीसबाडन वापस लौटे, जिसे अपरा ने जर्मनी का अपना शहर घोषित कर रखा है क्योंकि वहाँ आयरिस और थॉमस रहते हैं। यह देखकर हमें और आयरिस और थॉमस को बड़ी ख़ुशी हुई कि उनसे पिछली बार मिले अभी बहुत थोड़ा समय हुआ है मगर इस छोटे से वक्फे में ही अपरा ने जर्मन शब्दों और उसके व्याकरण का बेहतर ढंग से प्रयोग करना सीख लिया है और कुल मिलाकर जर्मन भाषा बोलने में भी बहुत सुधार हुआ है! वे लोग जर्मन में अपने आपको व्यक्त करने की उसकी क्षमता देखकर अचंभित रह गए!

शुक्रवार के दिन हम केवेलार के लिए रवाना हुए जहाँ शाम को मेरा एक कार्यक्रम था। शनिवार को, एक और शानदार कार्यक्रम के पश्चात हम कोस्फेल्ड की ओर निकल पड़े, जो वहाँ से लगभग एक घंटे सफ़र की दूरी पर स्थित है। वहाँ से रविवार को हम वापस वीसबाडन पहुँचे, जहाँ हम सिर्फ रात को सोने के लिए भर रुके और सुबह-सुबह फिर निकल पड़े इस यात्रा पर। तो इस तरह आज रात फिर हम एक नए बिस्तर पर सोएँगे! और अपरा? वह तो पूरी तरह आनंदमग्न है!

अक्सर हम ट्रेन से उतरते हैं, अपने मेज़बान दोस्तों को तलाशते हैं और अपरा किलकारियाँ मारकर ख़ुशी से झूम उठती है और कभी तो हथेलियों के पीछे चेहरा छिपाकर मेजबानों के साथ लुका-छिपी का खेल शुरू कर देती है और कभी जोर-शोर से हाथ हिलाते हुए उनका अभिवादन करती है। वह इन यात्राओं का भरपूर मज़ा ले रही है, कोई भी जगह हो, किसी से भी मिलना हो-जान पहचान का या अनजान, आश्रम आया हुआ कोई मेहमान हो या पिछले साल यहाँ परिचित हुआ कोई व्यक्ति! और उनके पालतू जानवरों से खेलते हुए तो वह सब कुछ भूल जाती है!

अभी भी उसे कार-यात्रा ज़्यादा पसंद नहीं है लेकिन बच्चों की कार-सीट को उसने तुरंत स्वीकार कर लिया और यहाँ के नियमों के अनुसार बेल्ट लगाकर अपनी सीट पर जाकर बैठ जाती है। फिर भी यह कहना पड़ेगा कि वह ट्रेन ज़्यादा पसंद करती है क्योंकि उसमें सवारी करने के बाद भी वह इधर-उधर घूम-फिर सकती है, यहाँ तरह-तरह के नए लोगों से मिलना-जुलना होता रहता है और सबसे मज़ेदार यह कि चलती गाड़ी में ही टेबल-कुर्सी पर बैठकर खाना-पीना भी चलता रहता है! ऐसे मौकों पर-जो उसे कुछ खास, अलग तरह के लगते हैं, जैसे हम जब ट्रेन में सफर कर रहे होते हैं-उसकी माँगें भी बढ़ जाती हैं, कुछ खास हो जाती हैं: जैसे वह फ्रेंच फ्राइज़ माँगेगी या आइसक्रीम या मीठी गोलियाँ। स्वाभाविक ही जब दिनचर्या सामान्य नहीं है तो फिर खाने-पीने में भी हर चीज़ कुछ खास होनी चाहिए!

कभी कभी हम उसकी इच्छाएँ पूरी करने की कोशिश करते हैं। लेकिन कई बार यह संभव नहीं हो पाता। ऐसी स्थितियों में हम उसे बताते हैं कि उसे फ्रेंच फ्राइज़ अवश्य मिलेंगी पर घर पहुँचकर और घर जाकर उसे आलू भूनकर दे देते हैं! 🙂

हम बहुत खुश हैं कि हमारी बिटिया हमारे साथ वाला यह समय आनंदपूर्वक बिता रही है और अभी से लगातार सफर की आदी होती जा रही है! और हम जानते हैं कि इसका मूल कारण उसका खुशमिजाज़ स्वभाव है और फिर उसमें हमारे प्रेम का भरपूर योगदान भी तो होता है!

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