चाँद के करीब से उड़ते हुए-जर्मनी की राह पर अपरा – 17 मई 2013

अपरा

मैं जर्मनी से ये शब्द लिख रहा हूँ। मैं इस वक़्त अपने मित्र थॉमस और आइरिस के फ्लॅट पर वीसबाडेन में हूँ। अपरा अभी-अभी सोई है और इस तरह मुझे कुछ समय मिला है कि भारत से अपरा के प्रथम जर्मनी प्रवास के बारे में आपको कुछ जानकारी दे सकूँ। यह उसकी सबसे लंबी और पहली हवाई यात्रा थी।

आश्रम परिवार से शानदार बिदाई के बाद हम वृंदावन से अल्ल सुबह रवाना हुए। दरअसल हम चाहते थे कि बिना हड़बड़ी और भागदौड़ के अपरा के साथ थोड़ा सा वक़्त एयर पोर्ट पर भी गुजारें. एयरपोर्ट आने से थोड़ा पहले तक वह सोती रही और वहाँ पूर्णेन्दु से बिदा लेकर हम एयरपोर्ट की इमारत के भीतर दाखिल हो गए। विशाल एयरपोर्ट में बड़ी संख्या में लोग थे और बहुत सी नई चीज़ें उसके देखने के लिए थीं। पूरा माहौल ही ऐसा था कि उसी आँखें आश्चर्य से खिल उठीं और वह मुझसे और रमोना से बार-बार पूछती, 'ये क्या है?', 'वो क्या है?'

हमारे पास इतना वक़्त था कि हम आराम से गेट तक आए और आराम से बैठकर आश्रम से लाए पराठे और सब्जी का नाश्ता किया। अपरा गेट तक आते हुए थक गई थी लेकिन थोड़ा सा भोजन पेट में पहुंचते ही वह एकदम चैतन्य हो गई और एयरपोर्ट का जायजा लेने लगी। रमोना उसके साथ एक-दो चक्कर एस्केलेटर के लगाकर आई और फिर वह आते-जाते हवाई जहाजों को देखने लगी और जर्मन भाषा में बीच-बीच में चिल्लाती, 'ए हवाई जहाज़, इधर आओ!' जब हवाई जहाज़ में चढ़ने का समय आया तब तक वह हमारे बहुत से सहयात्रियों के साथ दोस्ती गांठ चुकी थी। यह उसकी आदत है कि वह बड़ी उत्सुकता से अजनबी लोगों के पास पहुँच जाती है। अपनी सीटों पर बैठ जाने के बाद भी वह एक पल के लिए भी शांत बैठने वाली नहीं थी; कभी हेडफोन लगाकर देख रही है तो कभी पत्रिका उठाकर पढ़ रही है और आसपास बैठे लोगों के साथ तो उसे बतियाना है ही! आखिर हमारे जहाज़ ने उड़ान भरी। हम थोड़ा परेशान थे कि 8 घंटे के हवाई सफर को वह किस तरह ग्रहण करती है। हमें किसी ने बताया था कि टेक-ऑफ और लैंडिंग का वक़्त खासकर बच्चों के लिए मुश्किल का वक़्त होता है। हमारी बच्ची क्या करेगी? हम परेशान थे। लेकिन जब प्लेन ने रफ्तार पकड़ी और धरती छोडकर ऊपर उठा तब तक हमारी बच्ची सो चुकी थी!

पूरे 8 घंटे के सफर में अपरा सिर्फ एक घंटा सोई होगी। बाकी समय वह मनोरंजन के साधनों का जायजा लेती, हमारे साथ खेलती-बतियाती, अपने साथ लाया हुआ नाश्ता करती या कुछ किताबें, जो हम उससे छिपाकर लाए थे, उन्हें पढ़ती रही।

हम फ्रैंकफ़र्ट के करीब पहुंचे तो मैं उसे गोद में लेकर खिड़की वाली सीट पर आ गया और बाहर का नज़ारा दिखाने लगा जहां अभी बादल ही दिखाई दे रहे थे। मैंने उससे कहा कि हम चंद्रमा के करीब पहुँच गए हैं और हालांकि अभी चाँद दिखाई नहीं दे रहा था, उसने बड़ी समझदारी से सिर हिलाया। वह रोज़ ही चाँद देखती थी और आसमान की तरफ देखकर इशारे करती थी, चाँद के बारे में उसे कविताएँ याद हो गई थीं और अपनी किताबों में भी वह चाँद देखकर उत्सुक होकर उसके बारे में बात करती थी। कुल मिलाकर वह यह अच्छी तरह जानती है कि चाँद कहीं बहुत ऊपर होता है, और हम अभी ऊपर थे ही! हमने उसे बताया ही था कि हम लोग आसमान में उड़कर जर्मनी जा रहे हैं। जब फ्रैंकफ़र्ट एयरपोर्ट पर हमारा हवाई जहाज़ उतरने को ही था वह खिड़की से दिखती हर नजदीक आती चीज़ पर मंत्रमुग्ध हो उठती और चहकते हुए हमें बताती जाती। जैसे ही जहाज़ ने ज़मीन को छुआ मैंने उसे बताया, 'हम जर्मनी पहुँच गए!'

यशेंदु, थॉमस और आइरिस हमें लेने आए थे और हम अपने जर्मन घर पहुंचकर बहुत खुश थे। हम सोच रहे थे कि थकान के कारण अपरा तुरंत सो जाएगी, बल्कि शायद सो भी चुकी होगी, मगर बिल्कुल उल्टा हुआ। हालांकि भारत से आने के कारण हमारी रात हो चुकी थी, मगर वह तो एकदम तरोताज और चैतन्य लग रही थी और घूम-घूमकर सारे घर का जायज़ा ले रही थी। थकी तो वह अवश्य होगी, मगर इतनी उत्तेजित थी कि सोने के बारे में सोचना भी उसके लिए मुश्किल था।

थॉमस, आइरिस और कुछ दूसरे मित्रों ने उसके लिए कुछ खिलौने बनाकर रखे थे और वह उनसे खेलने लगी, फिर हम लोग भी इतनी थकान महसूस करने लगे कि उसे लेकर सोने चले गए। हम अभी भी भारतीय समय में ही थे और अपरा 3 बजे सबेरे ही उठ बैठी-पूरी तरह जाग्रत, तरोताजा और नए अनुभवों और कारनामों का लुत्फ उठाने ले लिए पूरी तरह तैयार!

मैं लंबे समय बाद जर्मनी आया था। जब मैं पहली बार यहाँ आया था मुझे यह भी नहीं पता था कि नक्शे में यह देश कहाँ स्थित है लेकिन बाद के सालों में मुझे हमेशा यही एहसास होता रहा है कि यह मेरा दूसरा घर है-और अब मेरी बेटी, एक जर्मन नागरिक जो भारत में पैदा हुई, अब इस देश को जानने की कोशिश कर रही है। वह कुछ ही देर में जाग जाएगी और फिर हम बाहर निकलकर कुछ खरीदारी करेंगे और उसे थोड़ा सा जर्मनी देखने का मौका भी मिलेगा।

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