अपरा का वर्ष 2013, उसके माता-पिता की नज़र में – 8 जनवरी 2014

अपरा

पिछले वर्ष पर विचार करते हुए, स्वाभाविक ही, 2013 का सबसे महत्वपूर्ण एहसास अपनी बेटी अपरा से संबन्धित होता है। वह हम सबके लिए एक विकसित होता हुआ कारनामा ही है। उसका मानसिक और शारीरिक विकास, उसका मूड, उसकी भाषा, उसका व्यवहार यह सब मैंने और मेरे परिवार ने बड़े गर्व और विस्मय के साथ देखा है।

वर्ष की शुरुआत में उसके निचले जबड़े में दो छोटे-छोटे दाँत निकलना शुरू हो गए थे। फिर जैसे-जैसे साल बीतता गया कुछ और दांत निकले और अब 2014 की शुरुआत में वह अपने बारह दाँत गिनकर दिखाती है, जिनमें से पीछे वाले बड़े दांतों को अलग से दिखाती है।

जी हाँ, वह उन्हें गिनती है। उसके पास कुछ किताबें हैं और कुछ गीत उसे याद हैं, जो खेल-खेल में उसे गिनती सिखाते हैं और वह उन्हें मनोयोग से पढ़ने की कोशिश करती है! उन्हीं किताबों और उनके गीतों से उसने हिन्दी, अंग्रेज़ी और जर्मन भाषा में भी दस तक गिनना सीख लिया है! उसने कुछ अक्षर भी सीखना शुरू कर दिया है और अंग्रेज़ी के बड़े अक्षरों में (capital letters में) लिखा हुआ अपना नाम पहचान लेती है।

लेकिन यह सिर्फ अंकों और अक्षरों की बात हुई, उसने इस साल के दौरान बहुत सारे नए शब्द भी सीख लिए हैं और वह भी तीन-तीन भाषाओं में! यह तो स्पष्ट ही है कि हिन्दी उसकी 'डिफ़ाल्ट लेंग्वेज' ('सहज भाषा') है क्योंकि ज़्यादातर 'इनपुट' हमेशा उसे इसी भाषा में प्राप्त होते हैं। पिछले काफी समय से वह पूरे-पूरे वाक्य भी बनाने लगी है। इतना ही नहीं, देखी गई या स्वनिर्मित काल्पनिक घटनाओं की लंबी-लंबी कहानियाँ भी अब वह सुना लेती है। और अब अपनी बातों में वह शुद्ध उच्चारण के साथ पूरी तरह व्याकरण-सम्मत वाक्यों का इस्तेमाल करती है!

हिन्दी के बाद उसकी प्रिय भाषा है जर्मन, जिसमें अपनी माँ के साथ उसका अनन्य वार्तालाप चलता है। साल के मध्य तक वह जर्मन भाषा में ज़्यादातर एक-एक शब्द का प्रयोग कर पाती थी लेकिन अब जर्मन भाषा में भी वाक्य बना लेती है, जो कई बार व्याकरण-सम्मत नहीं होते मगर वह तेज़ी के साथ इस भाषा में भी वाक्य रचना सीख रही है। सबसे अनोखी बात यह है कि वह भाषाओं को आपस में मिलाकर ऐसा घालमेल पेश करती है कि देखते ही बनता है: जैसे जर्मन क्रियाओं के साथ हिन्दी व्याकरण या जर्मन वाक्यों में हिन्दी शब्द, विशेषकर तब, जब उसे कोई जर्मन शब्द याद नहीं आता या उसका जर्मन स्थानापन्न उसे पता नहीं होता!

अंग्रेज़ी में अभी वह एक एक शब्द ही बोल रही है लेकिन हमारे आश्रम में आने वाले मेहमानों से "वॉट इज़ यूअर नेम" पूछना सीख गई है! हर आने-जाने वाले से बेझिझक, खुले मन से बात करने में उसे आनंद आता है। और वह इतना समझ गई है कि किससे किस भाषा में बात करनी है! कल आए अपने नाना की तरह जब भी कोई जर्मन व्यक्ति आश्रम आता है तो वह अपना पूरा जर्मन ज्ञान उसके सामने उंडेल देती है और जहां तक संभव होता है, हर बात जर्मन में अनुवाद करके कहने की कोशिश करती है!

दरअसल इस निस्संकोच खुलेपन का मुख्य कारण यह है कि वह पूरे समय बहुत से लोगों से घिरी होती है और हर कोई उससे बात करता ही रहता है। पिछले कुछ माह से उसे अपनी उम्र का एक दोस्त मिल गया है और वह दिन का अधिकांश समय उसी के साथ खेलते-कूदते, थोड़ा लड़ते-झगड़ते और फिर लाड़ करते हुए गुज़ारती है।

हमें उसकी उम्र के दूसरे बच्चों को देखने का काफी अवसर मिलता रहता है और जब कि हम जानते हैं कि हर बच्चा अलग-अलग परिस्थितियों में विकास कर रहा होता है, हम इस बात पर गर्व करते हैं कि वह बोलना सीखने के मामले में अपनी उम्र के सभी बच्चों से बहुत आगे निकल गई है और बहुत ज़्यादा स्मार्ट (समझदार) लगती है!

लेकिन जर्मनी में हम सबसे ज़्यादा गर्वान्वित हुए थे, जब हमने उसे अपने जर्मन मित्रों और रिश्तेदारों से मिलवाया और देखा कि कैसे सबसे बड़ी सहजता और आत्मविश्वास के साथ मिल रही है। उसके साथ वहाँ बिताया समय और यहाँ, भारत में उसके साथ खेलते हुए, उसे बौद्धिक और शारीरिक रूप से बड़ा होता हुआ देखते और उसे अधिकाधिक प्यार करते हुए बीता पिछला वर्ष बहुत अच्छा और शानदार रहा। हमें विश्वास है कि 2014 हमारे लिए और भी ज़्यादा विस्मयकारी घटनाएँ लेकर आया है!

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