अपरा की दूसरी जर्मनी यात्रा – 15 मई 2014

अपरा

हम लोग थका देने वाली मगर फिर भी काफी आरामदेह और अच्छी यात्रा के बाद सकुशल जर्मनी पहुँच गए। स्वाभाविक ही अपने घुटने की तकलीफ के बावजूद मुख्य रूप से अपरा के कारण यह यात्रा मेरे लिए बहुत सुखद रही।

अपरा इतने दिनों बाद दोबारा जर्मनी जाने के विचार से बहुत उल्लसित थी! कुछ सप्ताह पहले ही हमने उसे बता दिया था कि हम लोग जर्मनी जाने वाले हैं। उसके बाद हमें अपनी यात्रा दो सप्ताह के लिए मुल्तवी करनी पड़ी थी और उसे अपनी यात्रा पर सोचने का और तरह-तरह के अनुमान लगाने का काफी मौका मिला! पिछले कुछ हफ्ते से उसकी बहुत सी बातें इन शब्दों से शुरू होती हैं: 'जर्मनी में ये…' और 'जर्मनी में वो…'!

एक साल पहले की अपनी पिछली यात्रा की बहुत सी बातें उसे अच्छी तरह याद हैं। स्वाभाविक ही हम लोग भी उसे उसके बारे में बताते रहते थे और वहाँ के फोटो भी दिखाते रहते थे इसलिए वहाँ की यादें उसके मन में अब भी जीवंत हैं। जब से हमने उसे वहाँ जाने के बारे में बताया था वह उन लोगो के बारे में बात करती रहती थी, जिनसे वहाँ जाकर वह मिलने वाली है और हमारे मित्रों और उनके पालतू जानवरों के नाम लेती रहती थी-और यह भी कि उनसे मिलकर वह क्या-क्या करने वाली है। पिछले कुछ दिनों से वह इतनी शिद्दत के साथ वहाँ के अनुमान लगाती थी कि दिन में दस-दस बार बताती कि वह जर्मनी जा रही है, कि थॉमस और आयरिस उन्हें लेने आने वाले हैं और हम लोग वहाँ नाश्ते में जैम और ब्रेडरोल खाने वाले हैं।

और लगभग ऐसा ही हुआ। कल शाम को, तब, जब लगभग अपरा का सोने का समय होता है, हम आश्रम से रवाना हुए। कुछ देर वह कार में सोती रही और जब हम विमानतल पर पहुँचे, वह जाग गई थी और बहुत खुश और उल्लसित थी! विमानतल पर आगे बढ़ते हुए वह हर चीज़ की तरफ इशारा करते हुए उत्तेजना में चीख उठती और अपने छोटे से लाल सूटकेस को अपने पीछे खींचते हुए गर्व से भर उठती!

जब भी हम चेक-इन, इमिग्रेशन या सुरक्षा-जांच के लिए किसी क्यू में खड़े होते तो उसके लिए यह समझना मुश्किल हो जाता कि हम लोग बार-बार खड़े क्यों हो जाते हैं, आगे क्यों नहीं बढ़ रहे। फिर अपनी उतावली में वह कहती, 'चलो…' और कुछ कदम आगे बढ़कर कुनमुनाते हुए वापस लौट आती और हमारा काम खत्म होने का इंतज़ार करती।

उसने आसपास चारों तरफ देखा, विशेषकर आसपास के बच्चों का जायज़ा लिया, ऊपर-नीचे दो-चार चक्कर स्वचालित सीढ़ी (एस्कलेटर) के लगाए और जैसे ही हम विमानतल के दरवाज़े पर पहुंचे बहुत सारे हवाई-जहाजों को देखकर वह अभिभूत रह गई। विमान पर चढ़ने से पहले उसने साफ़ कहा, वह छोटे से हवाई जहाज़ में बैठना पसंद करेगी, बड़े में नहीं, क्योंकि वह अभी छोटी है। हमने उसे आश्वासन दिया कि हम लोग छोटा हवाई जहाज़ लेंगे।

जैसे ही हम हवाई जहाज़ के भीतर पहुंचे और हवाई जहाज़ ऊपर उठा वह तुरंत सो गई और विमान उतरने से लगभग दो घंटा पहले ही उठी। हमने इस बीच का पूरा समय खाते-पीते, खेलते और पढ़ते हुए गुज़ारा। जब जहाज़ के लैंडिंग का वक़्त हुआ तो वह बाहर निकलने के लिए उतावली हो गई और जर्मन नाश्ते की तरफ उसका ध्यान बंटाकर हम उसे बड़ी मुश्किल से दरवाज़ा खुलने तक रोक पाए।

फ्रैंकफर्ट में थॉमस और यशेन्दु से मिलना और उमस भरी गर्मी से निकलकर जर्मनी की साफ़-शुद्ध-हालांकि थोड़ी ठंडी हवा में साँस लेना बड़ा सुखद था। अपरा उन्हें देखकर खुशी के मारे उछल पड़ी और जब सब घर पहुँचे, वह सीधे खेल-कूद और मौज- मस्ती में डूब गई। वह मेरी छुटकी हीरो है और उसे इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि हम कहाँ हैं, जब तक हम लोग ठीक-ठाक हैं, वह खुश रहती है।

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