जर्मनी में अपने पहले सप्ताह में अपरा ने क्या अनुभव किया, कैसा महसूस किया! 19 मई 2014

यूरोप के हमारे तीन माह के दौरे की शुरुआत बहुत शानदार रही! और जबकि हम इस वक़्त दक्षिण जर्मनी की ओर जाने वाली ट्रेन में बैठे हुए हैं, और जबकि हम ट्रेन में बैठकर दक्षिण जर्मनी की ओर निकले हुए हैं, मैं यह लिखने जा रहा हूँ कि अपने पहले सप्ताह में अपरा ने कैसा महसूस किया और उसके क्या अनुभव रहे!

पहले कुछ दिनों को हमने कामों से पूरी तरह मुक्त रखा हुआ था और सारा समय यहाँ, वीज़बाडन में रहकर ही गुजारने वाले थे, जिससे मौसम और समय-क्षेत्र में हुए परिवर्तन के आदी हो सकें। हम यह अनुमान नहीं लगा सकते थे कि विमान यात्रा से अपरा को ठीक कितनी थकान और परेशानी होगी, यहाँ कितनी ठण्ड होगी, विशेषकर भारत की, जहां से हम आ रहे हैं, 40 डिग्री से ऊपर की गर्मी के मुकाबले और कुल मिलाकर अपरा को यह स्थान परिवर्तन कितना पसंद आता है। मगर यह अच्छा विचार सिद्ध हुआ-इसलिए भी कि अपरा यहाँ पर थॉमस और आइरिस के साथ बहुत मौज-मस्ती कर रही है!

रोज़ नाश्ते की मेज़ पर रखी हर चीज़ को अपरा चखकर देखती है और पिछले चार दिनों से हर चीज़ के बारे में पूछती रहती है: ये क्या है और वो क्या है? हम कहाँ आए हैं? हम यहाँ क्या करेंगे?…आदि आदि।

स्वाभाविक ही वह थॉमस और आयरिस को पहले से जानती है और इसलिए थोड़ी देर की शुरुआती शर्म के बाद उसने उनके साथ खेलना शुरू कर दिया और फिर उनके साथ खेलने बाहर भी चली गई। फिर वे लोग कई बार मैदान में खेलने गए, ब्रेड-रोल खरीदकर लाए और सामने के पोर्च में चाक से भी खेले। कभी-कभी रमोना, यशेन्दु या मैं उसके साथ होते थे और कई बार नहीं भी होते थे! उसके लिए यह वैसा ही था जैसे वह जयसिंह या आश्रम के किसी और बच्चे के साथ बाहर जाती है!

जर्मनी के अपने इस लम्बे दौरे से हमारी सबसे बड़ी अपेक्षा यह है कि अपरा काफी अच्छी जर्मन सीख लेगी और काफी आत्मविश्वास के साथ बोलने भी लगेगी। इन कुछ दिनों में ही हमें अहसास हो गया है कि यह विचार वाकई बहुत उपयोगी रहा-थॉमस और आयरिस के साथ जर्मन में बात करने की वह इतनी कोशिश कर रही है कि उसके शब्दज्ञान के उन शब्दों का भी वह इस्तेमाल करने लगी है, जो अब तक उसके दिमाग में सुप्त पड़े हुए थे!

थॉमस और आयरिस से फिर से मिलना, और यशेंदु के साथ होना, जो एक माह पहले ही जर्मनी आ चुका था, बहुत सुखद रहा। इसके अलावा वीज़बाडन में सिल्विया का स्वागत करते हुए भी, जो विशेष रूप से हमसे मिलने यहाँ आई थी, हम ख़ुशी से भर उठे। हमारा जर्मन घर, हमारे दोस्त और परिवार!

मेरा पैर, जो लम्बी हवाई-उड़ान के दौरान भी पीड़ारहित रहा, अब दिन-प्रतिदिन ठीक हो रहा है। अब मैं बैसाखियों का उपयोग नहीं कर रहा हूँ और हालाँकि मैं अब भी बंधनी (ब्रेसेस) लगाकर बहुत धीरे ही चल पा रहा हूँ, तकलीफ में सुधार स्पष्ट दिखाई दे रहा है! इस तरह बिना मेरे पैर की चिंता किए हम आज अपने सफ़र पर निकले हैं, सिर्फ इतना ध्यान रख रहे हैं कि पैदल चलते वक़्त एक जगह से दूसरी जगह धीरे-धीरे चलते हुए मैं पर्याप्त समय ले रहा हूँ।

अब हम दो हफ्ते के लिए दक्षिण जर्मनी जा रहे हैं-पहले अमरज़ी में कुछ कार्यक्रम हैं और फिर म्यूनिख और आउस्बर्ग जाएंगे, जहाँ रमोना के परिवार से मिलने की हम उत्सुकता के साथ प्रतीक्षा कर रहे हैं!

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