जर्मनी में अपरा का पहला सप्ताह – 24 मई 2013

अपरा

जर्मनी में आए हमें अब एक हफ्ता हो गया है और हालांकि हम छुट्टियाँ मनाने यहाँ आए हैं, जर्मनी में यह समय मेरे जीवन का सबसे घटनापूर्ण सप्ताह सिद्ध हुआ है। कारण स्पष्ट है: मैं अपनी बेटी के साथ पहली बार जर्मनी आया हूँ और अपरा को यहाँ एक नए परिवेश में देखना एक अद्भुत अनुभव रहा! हमने बहुत कुछ किया और बहुत शानदार समय बिताया!

हमने अपनी छुट्टियों की शुरुआत एक लंबे सप्ताहांत से की, जो थोड़ी सी छुट्टियों के लिए बिल्कुल उपयुक्त था। हमारी दोस्त सिल्विया और मेलोनी भी हमारे साथ थीं और हम सब जीव उद्यान (एनिमल पार्क) देखने गए। उस दिन सूरज निकला हुआ था और बच्चों सहित बहुत से परिवार भी साथ थे। हरे भरे मैदान में बच्चे खेलते-कूदते रहे और विभिन्न जानवरों को देखकर आश्चर्य चकित रह जाते। सबने खूब गप्पबाजी की और बहुत मज़े किए। पार्क बहुत खुला-खुला सा था और जानवर अपनी मर्ज़ी से बच्चों के पास आते कि वे उन्हें देखें और उनसे खाने का कुछ सामान प्राप्त कर लें। अपरा इतनी खुश और उत्साह में थी कि उसकी हरकतें देखकर हमारी हंसी रोके नहीं रुकती थी। वह विशालकाय बकरियों को अपने इतना नजदीक आता देखकर अचंभित रह गई। उसने हमें एक दड़बे में, जिसकी एक दीवाल काँच की थी, बैठे हुए गिनी पिग के बच्चे दिखाए। वह भेंड को छूकर नहीं देख सकी और उसके ऊन की और छूकर महसूस करने की गर्माहट से महरूम रही। हम उसे उस तरफ जाने से रोकते रहे जहां बतख के बच्चे अपनी माँ के पीछे-पीछे एक कतार में चले जा रहे थे और जब उसने कस्तूरी चूहे को देखा तो वह पोखर में कूदने के लिए मचल उठी कि उसके साथ तैरूँगी। सब कुछ बेहद लाजवाब था!

रविवार के दिन हम मेलोनी के घर गए जिसके पास न सिर्फ एक बड़ा सा कुत्ता है बल्कि एक घोडा और एक टट्टू भी है। हमारी सहायता से अपरा घोड़ों को घास खिलाने लगी और यह देखना बड़ा मज़ेदार था। जब उसे लगा कि घोडा उसके अनुमान से कुछ ज़्यादा ही बड़ा है और उसे खिलाने में बड़ी असुविधा है तो वह कुछ फूल चुनकर कुत्ते के पास गई और उसे खिलाने लगी, जिसने, स्वाभाविक ही मुंह फेर लिया। 16 माह की उम्र में वह पहली बार घोड़े पर बैठी और खुश हुई।

सोमवार के दिन भी हमारे कुछ मित्र आ गए जिनसे वह भारत में मिल चुकी थी। इतने सारे लोग, लेकिन उसे सबके नाम जानने की उतावली रहती थी और जब थॉमस की माँ हमसे मिलने और हमारे साथ पीत्ज़ा बनाने आईं तो वह उन्हें अपने खिलौने दिखाने लगी। एक-एक खिलौना निकालती और 'ओमा ब्याबल' कह-कहकर उन्हें दिखाती जाती।

सभी, हम भी, अपरा की नए शब्दों को सीखने की क्षमता पर अचंभित रह गए। जैसी कि हमें आशा थी उसका जर्मन शब्द ज्ञान तीव्र गति से विकसित हो रहा है। कुछ जर्मन व्यंजन भी अब उसके पसंदीदा व्यंजनों में शुमार हो गए हैं। ब्रेड और ब्रेड-रोल, खासकर मक्खन के साथ उसे बेहद पसंद है। रेस्तरां में पीत्ज़ा खाने एक दिन हम लोग बाहर भी गए थे और वह अपनी माँ के पीत्ज़ा में पड़ी हुई अपनी पसंदीदा चीज़ें निकाल-निकालकर चट कर जाती थी। कोई रोना-धोना नहीं, शिकायत नहीं, रूठना-मचलना नहीं। हमने उस शानदार शाम का समापन सुस्वादु आइसक्रीम से किया।

अपरा ने बड़ी आसानी से और बिना किसी समस्या के अपने नए परिवेश के साथ तालमेल बैठा लिया। हम रोज़ ही स्काइप पर आश्रम के लोगों से रू-बरू बात कर लेते है जिससे उसे वहाँ के लोगों की कमी का एहसास कम से कम हो। बात कर लेने के बाद और सबको देख लेने के बाद वह संतुष्ट हो जाती है। उसके साथ खेलने वाले आश्रम के बच्चों और उसे सड़क तक ले जाकर गायें दिखाने वाले कर्मचारियों के स्थान पर यहाँ हमारे जर्मन दोस्त हैं, जो उसके साथ खेलते हैं और उसे बाहर घुमाने भी ले जाते हैं। वह थॉमस और आयरिस के साथ बेकरी तक हो आई है और मेलोनी के साथ बाज़ार जाकर ठंड से बचने के लिए कान ढंकने का कनटोप खरीद लाई है।

अभी जर्मन मौसम के अनुरूप बहुत ठंड है और बारिश भी हो रही है। लेकिन मौसम हमें मौज-मस्ती से नहीं रोक पा रहा है। हमने एक कार सीट और बच्चागाड़ी खरीदी है जिसे हम आगामी वर्षों में धूमने फिरने के लिए इस्तेमाल करेंगे। अभी हम जर्मन छुट्टियों के अगले कार्यक्रम की तैयारी में लगे हैं। कल हम अपरा के जर्मन नाना-नानी के यहाँ, औक्स्बर्ग जा रहे हैं। अपरा की यह पहली रेल-यात्रा होगी। छुट्टियाँ मनाने के उत्साह और उत्तेजना में अभी कोई कमी नहीं आई है और मैं अपनी इस यात्रा के बारे में आपको आगे भी बताता रहूँगा!

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