अपरा की पहली यात्रा, जिसमें माँ और पा उसके साथ नहीं थे – 13 जुलाई 2015

अपरा

बच्चों के लालन-पालन के दौरान आप बहुत से अनुभव 'पहली बार' करते हैं। पिछले हफ्ते रमोना और मुझे एक बहुत बड़ा अनुभव हुआ: साढ़े तीन साल में पहली बार हमारी बेटी हमारे साथ हमारे बिस्तर पर नहीं सोई, पहली बार वह हमारे बगैर किसी यात्रा पर चली गई!

जी हाँ, अपरा बिना माँ और पा के एक लम्बी यात्रा पूरी कर वापस आ गई है। हर साल मेरी नानी को अपनी पेंशन लेने अपने गृहनगर जाना पड़ता है। उनके पति सरकारी मुलाजिम थे इसलिए उन्हें फैमिली पेंशन मिलती है- लेकिन पेंशन उन्हें वहीं से प्राप्त करनी पड़ती है, जहाँ वे पहले रहा करते थे और यह जगह है, मध्यप्रदेश के खजुराहो के पास स्थित एक शहर!

आश्रम में ठहरी हुई एक मेहमान, हाना ने भी वहाँ साथ जाने का इरादा कर लिया! और इस तरह नानीजी, पूर्णेन्दु, हाना और नानीजी की देखभाल के लिए एक महिला कर्मचारी- और हाँ, अपरा भी- पिछले बुधवार को प्रातः कार से खजुराहो की ओर निकल पड़े।

जब से वहाँ जाने का कार्यक्रम बना, अपरा ने ज़िद पकड़ ली कि इस बार चाचा के साथ वह ज़रूर जाएगी! पहले भी वह कई बार मचलती रहती थी मगर तब पूर्णेन्दु के साथ मेहमान होते थे और उसे गाइडेड टूर पर उनके साथ देश भर के लंबे सफर पर और काफी समय के लिए जाना होता था, लेकिन इस बार ऐसा कुछ नहीं था और फिर नानी भी और उसकी और आश्रम की एक विश्वस्त पारिवारिक सदस्य भी साथ रहने वाली थी। लिहाज़ा हम मान गए- हालांकि हल्के संदेह के साथ कि क्या वह हमारे बगैर जाएगी और क्या हमारे बगैर तीन दिन रह लेगी!

लेकिन अब लगता है, हम व्यर्थ चिंता कर रहे थे! वह तो जाने के लिए इतना व्याकुल और उत्साहित थी कि घर में रहने की बात भी सुनना नहीं चाहती थी! हमने उसे बार-बार बताया कि रात को उसे चिपटाकर सुलाने के लिए न तो माँ रहेगी, न पा। 'कोई बात नहीं, मैं मुन्नू चाचा से चिपटकर सो जाऊँगी!,' उसका जवाब होता। हम सोच रहे थे कि ऐन निकलते वक़्त शायद वह अपना इरादा बदल देगी लेकिन पता चला, हम कितना गलत सोच रहे थे: वह तो नानी से भी पहले फुदककर कार में बैठ गई और जब कार चल पड़ी, ख़ुशी के मारे पीछे वाली खिड़की से देर तक हाथ हिला-हिलाकर बाय बाय करती रही!

उस दिन पूरे समय और दूसरे दिन भी पूर्णेन्दु हमारी बिटिया के फ़ोटो भेजता रहा, जिनमें वह कभी हाथ हिला रही होती तो कभी तरह-तरह के पोज़ बनाकर हँसती-खिलखिलाती नज़र आती- ग्वालियर के किले के सामने, खजुराहो के किसी मंदिर की सीढ़ियों पर, पांडव जलप्रपात के सामने, होटल के स्वीमिंग पूल में नहाती और एक हाथी पर चढ़ी हुई!

वह तो आनंदमग्न, अपनी यात्रा के रोमांच का पूरा-पूरा मज़ा ले रही थी! लेकिन क्या वह यहाँ से भागकर चली गई थी और अपने माँ-पा को मिस भी नहीं कर रही है? निश्चय ही एक साढ़े तीन साला बच्चे के साथ यह हो ही नहीं सकता था! पहले दिन, रात को स्काइप पर चाचा की गोद में बिसूरती एक बच्ची का वीडियो कॉल प्राप्त हुआ, ‘अब मैं आप लोगों के पास आना चाहती हूँ!’ और उसके गालों पर आँसुओं की कुछ बूंदें लुढ़क पड़ीं! यह देखकर माता-पिता का दिल न डूबने लगे, संभव नहीं है! लेकिन फिर थोड़ी समझाइश और चतुर चाचा की तरफ से किए गए मनबहलाव के उपायों ने आखिर उसे नींद की गोद में धकेल ही दिया। और फिर दूसरे दिन कोई समस्या पेश नहीं आई!

और शुक्रवार को तीन दिन का शानदार समय बिताकर वे सब वापस भी आ गए! हमसे दूर दो रातें- लेकिन रोमांच और मौज-मस्ती से भरे तीन दिन- हमारी बिटिया अब वाकई काफी बड़ी हो गई है!

हाँ, लेकिन उसके बगैर हमें यहाँ कैसा लग रहा था? सोचता हूँ, कल का ब्लॉग इसी प्रश्न पर न्योछावर किया जाए!

अपरा की इस रोमांचक यात्रा के कुछ चित्र आप यहाँ देख सकते हैं।

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