कल मैंने आपको संक्षेप में बताया ही था कि अपरा की विदेश से वापसी कैसी रही! सच तो यह है कि वह इतनी खुश थी कि दिन भर मैं उसे मुश्किल से एकाध बार ही देख पाया! यह देखना वाकई अद्भुत था!
उसके दिन की शुरुआत भारतीय नाश्ते से हुई: आश्रम की रसोई में तैयार पराठों से! उसे यह भारतीय रोटी बहुत भाती है इसलिए अपने यूरोप दौरे में भी हम अक्सर पराठे बनाते थे। नाश्ता करते हुए वह हमारे कर्मचारियों से अपने परिचय को पुनर्जीवित करती रही। 'आंटियाँ', जो उससे बहुत प्यार करती थीं मगर जिनके साथ आश्रम वापस आने के बाद कुछ देर तक अपरा थोड़ा शर्माती रही।
लेकिन जैसे ही स्कूल के बच्चे दोपहर का भोजन करने पहुँचे, उसकी सारी शर्म रफूचक्कर हो गई! उसने भी अपनी प्लेट उठाई और स्वाभाविक ही, उनके जैसा महसूस करते हुए उनके साथ जाकर बैठ गई। और जब स्कूल की छुट्टी हो गई, आश्रम के बच्चों को वापस पाकर वह रोमांचित हो उठी!
उसके बाद सारा दिन, गर्मी और उमस के बावजूद, जिसके कारण सभी पसीना-पसीना हो रहे थे, वह उन बच्चों के साथ खेलती रही। जर्मनी में हमने एक साइकिल खरीदी थी, जिसमें पैडल नहीं हैं और जिसकी सहायता से बच्चे पैर और पंजों के सहारे संतुलन का अभ्यास कर सकते हैं। हमने उसे आज ही खोला था और हमारी बेटी उसे सारे बच्चों को दिखा-दिखाकर बहुत रोमांचित हो रही थी। तो उसके बाद लगभग एक घंटे तक छोटे-छोटे बच्चे उस पर और एक दूसरी खिलौना-कार पर सारे आश्रम में इधर से उधर धमाचौकड़ी मचाते दिखाई देते रहे।
इसी बीच अपरा का नहाना-धोना भी संपन्न हुआ । हमने एक टब में, जिसे हम छोटे से पूल की तरह उसके लिए इस्तेमाल करते हैं, पानी भरकर प्रवेश-हाल के बीचों-बीच रख दिया! यह उसकी नहाने की पसंदीदा जगह है! कुनकुने पानी में थोड़े से साबुन के झाग के साथ सबकी आँखों का आकर्षण बनी हमारी बेटी को जैसे जीवन की सबसे बड़ी ख़ुशी मिल गई थी-हर तरफ पानी उछालती, ज़्यादा पास आने वालों को पानी में सराबोर करती।
हालाँकि वह इतने सारे थकाने वाले कामों में लगातार सक्रिय रही लेकिन दिन में उसे झपकी तक नही आई। दोपहर की नींद वह सीधे गोल कर गई और खेलना नहीं छोड़ा। लेकिन हम देख रहे थे कि वह थक रही है! जब उन्हें देखने के लिए रमोना आकर सोफे पर बैठ गई तो अपरा उसके पास आई और उसकी गोद में चढ़कर बैठ गई और पल भर के लिए लगा कि अब थकान के आगे वह बेबस हो रही है-मगर फिर उसने ताक़त बटोरी, अपने आपको खींचकर रमोना की गोद से अलग किया, भागकर प्रांशु के पास गई और उसका हाथ पकड़कर बोली, 'चलो, कुछ खेलते हैं!'
शाम को, जब हम भोजन की तैयारी कर रहे थे, वह पूरी तरह थककर चूर हो चुकी थी। तब वह मोहित की गोद में थी और किसी कदर आँखें खोल ही नहीं पा रही थी! जैसे ही रमोना ने उसे अपनी गोद में लिया, वह नींद की गोद में समा गई।
और इस तरह उसके दिन का समापन हुआ, जिसे, हम जानते हैं, उसने सम्पूर्ण आनंद में जिया था। घर में होने से अधिक सुखद और क्या हो सकता है? अपनी नन्ही बच्ची को घर में होने के परम आनंद में सराबोर देखना!
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