जर्मनी में अपरा का पशुओं के साथ आमोद-प्रमोद – 7 जुलाई 2013

पिछले सप्ताह हम मज़े में एर्केलेंज पहुँच गए थे जहां हम अपने पुराने मित्रों सोन्या और पीटर और उनकी बेटी कारोलीन के साथ उनके यहाँ ठहरे हैं। यहाँ हमें बहुत से जानवरों का साथ प्राप्त हुआ -और यह हमारी बेटी अपरा को, जो किसी भी ऐसी चीज़ से प्यार करने लगती है जिसके पंजे हों, फर हो या बड़े बड़े नाखून हों, बड़ा रास आता है।

कारोलीन तो इंतज़ार ही कर रही थी अपरा का और वह उसकी तुरंत दोस्त बन गई। उनके यहाँ तीन बिल्लियाँ हैं। वह हमारी बेटी को अपनी बिल्लियाँ दिखाने ले गई और फिर जब भी अपरा ज़रा सा बोर होती सोन्या या कारोलीन के साथ उनके पास चली जाती। अपरा ने पहली बार इतने पास से बिल्लियों को देखा था, जिन्हें वह हाथ में ले सकती थी, थपकियाँ देकर उनके साथ खेल सकती थी। वह उनके साथ खेलते हुए उत्तेजना में खुशी से चीखने -चिल्लाने लगती थी और उसका शोर सुनकर बिल्लियाँ भाग जातीं। उम्र में सबसे बड़ी बिल्ली अवश्य संयम से उसके पास बनी रहती और अपरा की थपकियाँ, चांटे सब कुछ सहन करती रहती। खेल-खेल में बिल्ली अपरा के हाथ में सूँघती हुई गुर्राती जिससे अपरा को बड़ा मज़ा आता और बदले में वह उसके दोनों कान पकड़कर उसके मुंह में ही गुर्राना शुरू कर देती!

मगर उनके यहाँ सिर्फ बिल्लियाँ ही नहीं थीं, और भी बहुत कुछ था! मौसम कुछ अच्छा हो गया था और हम आँगन में और आगे बगीचे में भी जा सकते थे जहां उसके साथ खेलने के लिए पत्थर के शेर, पत्थर का साही, एक पत्थर का बत्तख, पत्थर का मेंढक और पत्थर की बिल्लियाँ भी थे! वह एक के बाद दूसरे की तरफ दौड़ लगाती रहती और उन्हें खाना खिलाने की कोशिश करती, कभी घास तो कभी फूल-पत्ते तो कभी मिट्टी। यहाँ तक कि वह उनसे बातें भी करती। एक बार हमने देखा कि वह एक बिल्ली के बुत के सामने खड़ी है और दोनों हाथ छाती पर जोड़कर उससे बिल्कुल भारतीय तरीके से 'नमस्ते' कह रही है!

लेकिन इतना ही नहीं था वहाँ! सोन्या के घर के पिछवाड़े में छोटी सी खुली जगह थी जहां की घास वे लोग कटाई मशीन से काटते नहीं थे बल्कि बीच-बीच में वहाँ कुछ भेंड़े छोड़ देते थे जो उन्हें चरती रहती थीं और घास बराबर हो जाती थी! कुल सात भेड़ें थीं और अपरा उन्हें ब्रेड और गाजर खिलाकर खुशी से किलकारियाँ मारने लगती थी। वहाँ भी हमारी बातूनी बिटिया चुपचाप यह काम नहीं करती थी बल्कि जब भेंड़े 'माँह, माँह' कहतीं तो वह भी लंबा सी 'माँहहहह' की आवाज़ निकालकर उनका जवाब देती! एक दिन उसे लगा कि भेंडों को जो ब्रेड वह खिलाती है, शायद बहुत स्वादिष्ट है इसलिए उसने वही ब्रेड खुद खाना शुरू कर दिया। उसके सामने भेंड़े खड़ी हैं और ताक रही हैं कि कब अपरा उनके मुंह में ब्रेड देती है और एक के बाद ब्रेड के टुकड़े अपरा खुद अपने मुंह में डाल रही है! उसने पीछे मुड़कर देखा और अचानक बच्चों की एक भारतीय कविता की पहली पंक्ति गाना शुरू कर दिया। उसकी कविता का भेंडों पर कोई असर नहीं हुआ मगर हमारी लाड़ली खुशी से नाच उठी!

मौसम सुहावना होने से हम लोगों को एक मेले में जाने का अवसर भी मिल गया। चमत्कृत होने के लिए अपरा को वहाँ एक से एक चीज़ें उपलब्ध थीं। इतने सारे लोग, रोलर कोस्टर, बैलून्स, रुई भरकर बनाए गए सुंदर-सुंदर जानवर, लोगों के साथ आए हुए कुत्ते, और बच्चे। बच्चों के लायक एक वृत्ताकार झूले को हमने चुना और अपरा एक हाथी पर बैठी, बड़ा मज़ा आया! हमने आइसक्रीम भी लिया और ज़ेब्रा के आकार वाला बैलून भी खरीदा। हमारी बिटिया खुश हो गई और हमें भी बड़ा आनंद आया।

हाँ, एक छोटा सी दुर्घटना भी हो गई: उसका गॉगल गुम गया। उसके पास छोटा सा एक गॉगल था जिसे हम लेकर आए थे मगर कहीं भीड़ में वह खो गया। ल्युनेबर्ग आते ही सबसे पहले हमने उसके लिए गॉगल खरीदा क्योंकि हम सबको वह गॉगल पहने देखती थी और परेशान करती थी!

आन्द्रेया और माइकल हमारा इंतज़ार कर रहे थे कि हमारे साथ कुछ समय बिताएँगे। इतना शानदार मौसम था और हमारे करने के लिए इतनी सारी चीज़ें थी। हम ताज़ी सब्जियाँ खरीदने बाज़ार गए फिर स्टेडियम घूमकर आए। आइसक्रीम खाई। बत्तखों, मोरों और मुर्गियों को ब्रेड खिलाई और अभी जानवर देखने ज़ू (एनिमल पार्क) जाने वाले हैं। अगले कुछ दिनों का प्लान भी हम बना रहे हैं और जानते हैं कि जैसे ही हम घर पहुंचेंगे अपरा 'जजजजॉय', 'जजजजॉय' पुकारते हुए इधर-उधर दौड़ती-भागती रहेगी; अभी वह शांत नहीं बैठने वाली। जॉय आन्द्रेया की एक बिल्ली का नाम है जो अपरा को देखते ही उससे दूर भाग जाती है!

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