अपरा का पहला भारत-भ्रमण और उसकी मौज-मस्ती – 26 दिसंबर 2013

पिछले दिनों हमारे लखनऊ प्रवास के बारे में आपको बताने के बाद अब मैं चाहता हूँ कि इस सैरसपाटे में अपरा की मौजमस्ती और उसके अनुभवों के बारे में भी आपको बताऊँ कि स्थान परिवर्तन को और बहुत सी नई चीजों को उसने किस तरह देखा, अनुभव किया और उनके प्रति उसकी कैसी प्रतिक्रिया रही।

मैंने पहले आपको बताया था कि किस तरह गुरुवार की शाम ट्रेन में न चढ़ पाने को लेकर अपरा बहुत निराश हो गई थी और फिर कैसे अपने आपको दिल्ली विमान-तल पर पाकर खुशी से भर उठी थी। होटल में नई जगह को लेकर वह ज़्यादा परेशान नहीं थी; कोई हिचकिचाहट नहीं, सिर्फ जोश और उत्तेजना और हर नयी चीज़ की जांच-परख और हर चीज़ को जान-समझ लेने की उत्सुकता।

शाम के बाद जाकर ही कहीं वह थोड़ा सुस्ताई और खाना खाते समय थोड़ा मायूस दिखाई दी। होटल का खाना अच्छा था मगर वह वहाँ बैठने के लिए तैयार नहीं थी, रेस्तरां में उसकी चुलबुलाहट भी नज़र नहीं आई। बस, वह वहाँ से किसी तरह निकलना चाहती थी। तो हमने जल्दी-जल्दी अपना खाना खत्म किया और अपने कमरे की तरफ चले आए। हम सोच रहे थे कि हर हाल में खुश रहने वाली हमारी लाड़ली अचानक इतना चिड़चिड़ा क्यों रही है और कमरे की तरफ आते हुए हमें पता चला कि उसे घर की याद आ रही है!

इसलिए अपने कमरे में आकर हमने तुरंत स्काइप ऑन करके आश्रम कॉल किया और जब उसने सबसे बात कर ली तब जाकर उसके चेहरे पर संतोष और खुशी लौटी और फिर उसने अपने नए जूते उन्हें दिखाए और अपनी दिन भर के कारनामों के बारे में विस्तार से उन्हें बताया। और आखिर में पूरी तरह थककर नींद की आगोश में समा गई। नींद में भी उसके चेहरे पर हंसी खिली हुई थी।

पूरे सप्ताह में घर की याद का यही एकमात्र दौरा उस पर पड़ा और बाकी की छुट्टियों में वह पूरी तरह आनंद में डूबी रही! जब हम बाहर घूमने निकले, वह सो रही थी लेकिन जब एक बार उठी तो फिर, चाहे स्मारक स्थल हो या बाग़-बग़ीचा हो, इधर से उधर दौड़ना-भागना शुरू कर दिया। वह जहां जाती उसके आसपास दूसरे बच्चे इकट्ठा हो जाते और वह उनके साथ खेलना शुरू कर देती और कई बार वहाँ से कुछ न कुछ ले आती, जैसे एक बार बिस्किट ले आई थी।

एक बार बड़ा इमामबाड़ा में हुआ यह कि वहाँ हमें जूते उतारने थे। अपरा ने जूते उतार लिए परन्तु साथ ही मोज़े भी उतारना चाहती थी। वह मोज़े पहनकर फर्श पर खड़े नहीं होना चाहती थी, "मेरे मोज़े गंदे हो जाएंगे!" वह चीखी और जब हमने उसके मोज़े भी उतार दिये तभी मानी और फिर नंगे पाँव ठंडे फर्श पर चलते हुए उसे बड़ा मज़ा आया।

उसके लिए सबसे आकर्षक जगह थी चिड़ियाघर, जहां वह हमें एक एक जानवर दिखाने लगी। मगरमच्छ देखकर वह इतनी मंत्रमुग्ध हो गई कि मेरे मुख से पहले कई बार सुनी मगरमच्छ की कहानी बार-बार सुनना चाहती थी। मेरे मित्र मनीष की बेटी, अलीशा, जो उससे आधा साल बड़ी है, के साथ उसकी पक्की दोस्ती हो गई थी। वे दोनों हाथ में हाथ डाले, एक-दूसरे के कंधे पर बांह झुलाते घूमते रहे और बहुत देर खेलते-कूदते रहे।

इसके अलावा कुछ ऐसे जानवर भी थे, जिनके पास वह बहुत करीब चली जाती थी: मेरे फेसबुक मित्र अवधेश जी के कुत्ते से उसकी अच्छी ख़ासी दोस्ती हो गई थी, जो अपरा से उम्र में तो छोटा था मगर आकार में निश्चय ही बहुत विशाल था! जब वह अपरा से खेलने की कोशिश करता तो वह खुशी से चहक उठती और उसे हल्का सा छूकर किलकारी मारते हुए हमारी तरफ देखने लग जाती। शहर में हमने एक तांगा देखा और रिक्शा की जगह उसे किराए पर ले लिया-फिर तो उसकी खुशी का ठिकाना नहीं रहा। वह तांगे वाले से उसकी लगाम ले लेती और सगर्व हमसे कहती कि वह तांगा चला रही है!

इतवार को जब हम वापस लौटने के लिए ट्रेन में सवार हुए तब वह सो रही थी और चलती ट्रेन में सबेरे-सबेरे उसकी नींद खुली। आखिर ट्रेन में बैठने का उसका सपना पूरा हुआ था और वह इस बात से बहुत खुश हुई। मगर उसके लिए सबसे बड़ी खुशी थी घर वापसी! वापसी में भी ट्रेन पाँच घंटा लेट हो गई थी लेकिन हमें कोई परवाह नहीं थी। हम ट्रेन में बैठे थे और हमें वापस घर पहुँचना था। ट्रेन कभी भी पहुंचे हमें क्या फर्क पड़ने वाला था, विशेषकर तब, जब अपरा को कोई परेशानी नहीं थी और हम उसे प्रसन्नचित्त रख पा रहे थे। इसके अलावा उसके पास उसके खिलौने भी थे, जिनके साथ वह खेलती रही।

इस तरह हमने यह लंबा सप्ताहांत बहुत आनंद और उल्लास के साथ व्यतीत किया। मुख्य बात यह कि अपरा ने सफर के दौरान भरपूर मौजमस्ती की। अब हमें पता चल चुका है कि हम कहीं भी, कभी भी अपनी लाड़ली के साथ घूमने निकल सकते हैं!

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