अपरा को चेचक निकल आई है – फिर भी वह हंस-खेल रही है- 3 अक्तूबर 2013

शहर:
वृन्दावन
देश:
भारत

पिछले कुछ समय से आश्रम में जो कुछ चल रहा है, उसके बारे में मैं आज आपको बताना चाहता हूँ। पिछले कुछ सप्ताह से आश्रम में बहुत रोचक बातें हो रही हैं-तब से, जब एक शाम हमारे साथ रहने वाला प्रांशु, जो उम्र में सबसे छोटे बच्चों में गिना जाता है, हमारे पास अपनी छाती पर उभरे कुछ अजीबोगरीब निशान दिखने आया, जो फुंसियों की तरह दिखाई दे रहे थे। हम उसे डॉक्टर के पास ले गए और हमारा शक सही निकला: उसे चेचक निकल आई थी।

हमने भरसक कोशिश की कि अपरा को भी यह छूत की बीमारी न लगे लेकिन तीन दिन पहले उसके हाथ पर दो छोटे-छोटे छाले दिखाई दिये तो हमें लगा कि उसे भी डॉक्टर के पास ले जाना पड़ेगा। उसने तुरंत पुष्टि कर दी कि उसे भी चेचक हो गई है।

जब प्रांशु स्वस्थ हो रहा था, हम खुश थे कि अब अपरा को यह बीमारी नहीं होगी। जब बीमारी की पुष्टि हो गई तब भी हम आश्वस्त थे कि बीमारी ज़्यादा तीव्र नहीं होगी। अब चौथे दिन हमें खुशी है कि खुजली से बेचैन कर देने वाले छालों के बावजूद उसे बुखार नहीं आया है और वह हंस रही है, खेल-कूद रही है और हमेशा की तरह खुश है।

इसके बावजूद कि उसके आधे चेहरे पर लाल दाने निकल आए हैं, उसे हँसते और अपनी कहानियाँ सुनाते हुए देखना, जैसे कुछ हुआ ही न हो, आश्चर्यचकित कर देता है। सिर्फ दवाएं खाते वक़्त वह रोती है। दवा खाना उसे बिल्कुल नहीं सुहाता। इसलिए नहीं कि वह कडुवी होती है, या उसकी गंध उसे पसंद नहीं है बल्कि इसलिए कि उसे पीना पड़ता है-दवाइयाँ तो, वैसे भी, बच्चों को दिए जाने वाले मीठे सिरप हैं, जिनमें से संतरे की भीनी खुशबू आती है। हमने अपनी बेटी को हर तरह से मनाकर देख लिया और उसे बहलाने-फुसलाने की कोशिश भी की कि किसी तरह वह फलों का रस समझकर दवा पी ले लेकिन वह इतनी होशियार हो गई है कि उसे बुद्धू बनाना बहुत मुश्किल है। लेकिन यह समस्या मिनट भर की है और एक बार दवा पेट में उतर गई कि फिर वह मुस्करा देती है और हमें समझाते हुए कहती है: बीमार पड़ने पर दवा लेना ज़रूरी होता है! फिर वह हमें आश्वस्त भी कर देती है कि अगली बार दवा लेते वक़्त वह नहीं रोएगी। दरअसल, वह मानने के लिए तैयार ही नहीं होती कि इस बार भी वह रोई थी।

हम उसके छालों पर दवा लगाने का काम नियमित रूप से कर रहे हैं और इस समय हमारा पसंदीदा खेल हो गया है, डॉक्टर डॉक्टर, जिसमें हम उसके सारे खिलौना जानवरों की स्टेथस्कोप लगाकर जांच करते हैं, जैसा कि डॉक्टर ने उसके साथ किया था। हम यह सोचकर भी खुश हैं कि अच्छा हुआ हम सभी को, जीवन में एक बार होने वाली यह बीमारी हो चुकी है इसलिए हम अपरा के साथ निर्द्वंद् खेल सकते हैं। एक बात पर हमें बार-बार आश्चर्य होता है कि सर्दी जैसी छोटी-मोटी बीमारी होने पर भी हम वयस्क-औरत और मर्द, दोनों इतने परेशान हो जाते हैं जैसे मर ही जाएंगे। हम चुपचाप बैठ जाते हैं और कुड़कुड़ाते हुए तकलीफ सहते रहते हैं। और यहाँ यह छोटी सी बच्ची है, जिसके शरीर में वाइरस और एण्टीबायोटिक्स के बीच- घुसपैठियों और उसके प्रतिरक्षा तंत्र के बीच-युद्ध छिड़ा हुआ है और वह हमें अपने हाथों से पकवान खिला रही है, कमरे में संगीत चलवाकर नाच-गा रही है, हमसे कह रही है कि गाय देखने चलो और हमें योगासन करके दिखा रही है। नीचे आप एक वीडियो देख सकते हैं, जिसमें वह डॉक्टर के पास हुए अपने अनुभव और थोड़ी सी गिनती, एक कहानी और भारत का राष्ट्रगीत सुना रही है।

यह नैसर्गिक बात है। यह एक बच्चे का प्रतिरक्षा तंत्र है जो हमारे प्रतिरक्षा तंत्र से बहुत अधिक मजबूत होता है और इसके अलावा, यह एक बच्चे का, जिसे अपनी बेटी कहते हुए मैं फूला नहीं समाता हूँ, प्रसन्नचित्त स्वभाव है। हम आशा करते है और हमें विश्वास भी है कि खुजलाहट का आज आखिरी दिन होगा और कल से छाले सूखने शुरू हो जाएंगे और उसे आगे से अपने शरीर को खरोंचना नहीं पड़ेगा।