आज भारत का स्वतन्त्रता दिवस है और अपनी आधी भारतीय, आधी जर्मन बेटी के बारे में, जो दिन-ब-दिन स्वतंत्र होती जा रही है, लिखने का इससे अच्छा अवसर कौन सा होगा! जी हाँ, निश्चय ही उसका सब कुछ आधा आधा है! उसके पास जर्मन पासपोर्ट है लेकिन रोज़ हमारे स्कूल के बच्चों के साथ वह भारतीय राष्ट्रगीत गाती है!
हमारी बेटी, अपरा अब एक साल और सात महीने की हो गई है, वह 80 सेंटीमीटर ऊंची है और उसका वज़न साढ़े नौ किलो है। जिस तेज़ी के साथ उसका दिमाग विकसित हो रहा है और जिस तेज़ी के साथ वह जानकारियों को पकड़ती है, उनका विश्लेषण और उपयोग करती है, ये आंकड़े उस वास्तविकता का पूरा बयान नहीं करते!
उसकी सबसे मोहक बात मुझे लगती है, उसका एक साथ तीन-तीन भाषाएँ बोलने का प्रयास। दिन भर इन भाषाओं के बीच विचरते हुए वह तीनों में बड़ी तेज़ी के साथ विकास कर रही है। हिन्दी में काफी समय से वह पूरे वाक्य बना लेती थी और अब वह जर्मन भाषा के शब्दों को जोड़कर भी वाक्य बना लेती है। हैरानी की बात नहीं कि अभी उसका व्याकरण पूरी तरह ठीक नहीं होता-जैसा कि उसकी माँ मुझे बताती है-लेकिन फिर सोचता हूँ कि मैं इस मामले में अकेला नहीं हूँ, जो शब्दों को लेकर इस संदेह में रहता है कि किस शब्द के बाद कौन सा शब्द आना चाहिए। बात यह है कि अपरा मुझसे पहले जर्मन भाषा में सही वाक्य रचना सीख जाएगी। और वह यह भी जानती है कि किससे, किस भाषा में बात करना है कि वह समझ जाए! उसका मस्तिष्क भाषाओं के बीच अंतर को समझने लगा है। कभी-कभी अलग-अलग भाषाओं के शब्द एक ही वाक्य में आ जाते हैं लेकिन अगर आप पूछें कि घोड़े को हिन्दी या जर्मन में क्या कहते हैं तो वह दोनों भाषाओं में सही अर्थ बताती है!
अपरा अब कई छोटी कविताएं और नर्सरी राइम्स कंठस्थ कर चुकी है और जब, जैसी उसकी मर्ज़ी होती है, तीनों भाषाओं में गाकर सुनाती है। कभी भारत का राष्ट्रीय गीत सुनाने लगती है तो कभी 'ए फॉर एपल' और फिर बच्चों के एक जर्मन गाने में हाथी की नकल उतारने लगती है! स्वाभाविक ही, आश्रम के लड़के भी जर्मन भाषा के कुछ शब्द सीख गए हैं!
हम भी उसके साथ बच्चों की कविताएं और गाने गाते हैं और फिर कहानियाँ तो होती ही है। अपनी जर्मन किताबों से उसे बेहद लगाव है और वह रात में नींद से लड़ती हुई अपनी माँ के साथ उन्हें पढ़ती है और कभी-कभी दिन में उसे लेकर मेरे पास आती है और शब्दों को लंबा खींचते हुए कहती है "और बंदर बोला….." जिसका मतलब होता है कि उसके वाक्य को पकड़कर आगे ले जाओ और कहानी शुरू करो। जब बंदरों, मगरमच्छों और शेरों की कहानियाँ नहीं होतीं तब हम जर्मनी और अपनी पिछली जर्मनी यात्रा के विषय में गपशप करते हैं, जो अब भी उसकी चमकती आँखों में तरोताजा हैं। जब वह लोगों को आश्रम से बाहर निकलते देखती है तो समझ जाती है कि वे मथुरा, दिल्ली या जर्मनी जा रहे होंगे!
अपरा की चारित्रिक विशेषताएँ भी अब निकलकर बाहर आ रही हैं और हमें लगता है कि उसके पास मजबूत इच्छाशक्ति है-वह क्या करना चाहती है, कब करना चाहती है और किसके साथ करना चाहती है इसका निर्णय वह बड़ी स्पष्टता और दृढ़ता के साथ करती है। वह सब कुछ खा लेती है मगर यह तय करती है कि कौन सी चीज़ कब खाना है। बच्चों के साथ उसके खेल बड़े मज़ेदार होते हैं लेकिन आश्रम में सभी जान गए हैं कि किसका, कौन सा काम, कब उसे अच्छी नहीं लगता: तब वह कान-फोडू आवाज़ में चीखती-चिल्लाती है। हम उसे सिखाने का प्रयास कर रहे हैं कि वह अपना गुस्सा शब्दों में किस तरह व्यक्त कर सकती है और यह भी कि ऐसा करना, कैसे ज़्यादा प्रभावशाली होता है, क्योंकि तब लोग जान सकेंगे कि वह क्या चाहती है!
जब वह एकाध साल पुराने चित्र देखती है तो हँसती है और अपने बचपन को याद करते हुए उसके मुंह से निकल पड़ता है 'छुटकी अपरा'! साफ है कि सिर्फ हम ही नहीं सोचते कि हमारी 'छुटकी' इतनी बड़ी हो गई है!
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