अपरा जर्मनी के लिए उड़ चली: पहली बार भारत से बिदा! – 16 मई 2013

शहर:
वृन्दावन
देश:
भारत

आज वह महत्वपूर्ण दिन आ ही गया जिसका हम बहुत दिनों से इंतज़ार कर रहे थे और उसके लिए तैयारियां भी करते जा रहे थे। अपरा, रमोना और मैं आज जर्मनी के लिए रवाना हो रहे हैं। हमारी तैयारी पूरी हो चुकी है और छुट्टियों पर निकलने के लिए कार में सवार होने से पहले यह डायरी लिखना भर बाकी है। अपरा पहली बार जर्मनी जाएगी और हम सब वहाँ होने वाले उसके स्वागत और दूसरे नए अनुभवों को लेकर उत्साहित हो रहे हैं।

बच्चों के साथ जीवन बदलता ही है और सफर में तो और ज़्यादा। हम हमेशा तकनीकी चीजों और कुछ मसालों से अपनी सूटकेसें भर लेते थे मगर इस बार ज़्यादातर सामान अपरा का है। मेरे लिए और रमोना के लिए जर्मनी में भी बहुत से कपड़े हैं लेकिन अपरा के लिए हमें हर तरह के मौसम के कपड़े रखने पड़े क्योंकि इन कुछ सालों में जो बात मैंने जानी है वह यह कि आप जर्मनी के मौसम के बारे में निश्चित रूप से कुछ नहीं कह सकते।

स्वाभाविक ही हम सोच रहे हैं कि वहाँ की बातों को वह किस तरह ग्रहण करेगी, किस तरह की उसकी प्रतिक्रिया होगी! हवाई जहाज़ में उड़ना उसे कैसा लगेगा? क्या वह इस दौरान पूरे समय सोती ही रहेगी या जहाज़ में भी उसका इधर-उधर घूमना और मचलना जारी रहेगा? एयर होस्टेस को परेशान तो नहीं करेगी या लोगों के सामान के साथ छेड़छाड़ तो नहीं करेगी? अगर वह उत्सुक दिखाई दी तो निस्संदेह हम उसे पूरा हवाई जहाज़ दिखाएँगे ही। उसके लिए हमने कुछ खिलौने भी रख लिए हैं और अपने लिए कुछ किताबें। सफर में बोर तो हम होंगे ही नहीं।

पहुँचने के बाद सबसे पहले तो हमें देखना होगा कि कैसे वह समय परिवर्तन का सामना करती है और जेट लेग से कैसे तालमेल बैठाती है। कहीं ऐसा न हो कि हमें कुछ दिन रतजगा करना पड़े जब तक कि वह यह समझ न ले कि अब उसे चार घंटे बाद में सोना है और चार घंटे बाद ही उठना है। उसकी नींद का सामंजस्य भी बिगड़ सकता है, जो कि अभी बहुत बढ़िया है। इसके साथ ही भोजन का समय भी स्वाभाविक ही बदल जाएगा।

खाने की कोई समस्या नहीं होगी-हम लोग अपना खाना हमेशा की तरह खुद ही बनाएंगे, इसलिए वह भी वही खाना खा सकेगी जिसकी वह आदी है, और वह सब कुछ मज़े में खा लेती है इसलिए नई तरह के खानों को भी आजमाया जाएगा और मुझे यकीन है उसे कोई दिक्कत नहीं आएगी। इसके अलावा हमने कुछ आटा भी साथ ले लिया है जो जर्मनी में कभी-कभी मुश्किल से ही मिल पाता है। तो हम पराँठे, रोटियाँ भी जब वह चाहेगी, उसके लिए बना सकेंगे। और बहुत से भारतीय व्यंजन भी हमारे साथ हैं, मूड़ी, मखाने वगैरह!

हम यह जानने के लिए भी उत्सुक हैं कि उसे स्ट्राबेरीज़, रासबेरीज़ और दूसरी भारत में न मिलने वाली बेरियाँ पसंद आती हैं या नहीं। यह तो तय है कि उसे आईसक्रीम तो पसंद आयेगी ही। यहाँ आम की आइसक्रीम तो वो रोज ही खाती है और वहाँ तो उसके लिए कई और फ्लेवर भी मिल जाएंगे। निस्संदेह हम यह देखना चाहते हैं कि वह वहाँ सबसे कैसे मिलती है। वह पहले ही अपने नाना-नानी को जानती है और थॉमस और आइरिस को भी। इन सभी को वह स्काईप पर देखती है और बात भी करती रहती है। माइकेल और ऐन्ड्रिया, जो उत्तर में रहते हैं, यहाँ आए थे मगर बहुत पहले, जब वह काफी छोटी थी; वह उन्हें नहीं पहचान पाएगी। और बाकी के दूसरे रिश्तेदार और दोस्त उसे पहली बार देखेंगे।

हमारे कुछ मित्रों के यहाँ बिल्लियाँ पाली गई हैं। अपरा जानवरों से बहुत प्यार करती है और अक्सर पड़ोस में जाकर गायों को देखती है और खुश होती है। मगर हमारे यहाँ बिल्ली पालने का रिवाज नहीं है और कभी दिख भी जाती है तो वह इतनी शर्मीली होती है कि अपरा उसे छू नहीं पाती,खेलना तो दूर की बात है। तो हम यह देखने के लिए भी उतावले हैं कि बिल्लियों और दूसरे जानवरों के निकट संपर्क में आने पर वह क्या प्रतिक्रिया देती है। निश्चय ही वह पूर्णेन्दु, बाबाजी और नानीजी की अनुपस्थिति महसूस करेगी। इसके अलावा बच्चों की और आश्रम के दूसरे कार्यकर्ताओं को भी वह मिस करेगी। कोई बात नहीं, हमारे पास जर्मनी में भी स्काइप होगा और वह उन्हें देख पाएगी और बात भी कर पाएगी। वह यहाँ अपनी नई नई सीखी जर्मन भाषा का प्रदर्शन भी अच्छे से कर पाएगी और मुझे लगता है कि जब तक हम वापस होंगे वह जर्मन भाषा बेहतर ढंग से बोल पाएगी। कितनी सारी बातें हैं जो हमें उत्साहित कर रही हैं और कितनी सारी नई बातों का हमें एहसास होने वाला है! मैं आपको अपने अनुभवों से अवगत कराता ही रहूँगा, मगर एक बात तय है कि हम बहुत शानदार समय बिताने जा रहे हैं!