काफी समय हो गया, मैंने हमारी बेटी, अपरा के विषय में कुछ नहीं लिखा। यहाँ मैं 'बेबी' लिखते-लिखते रह गया क्योंकि तीन साल और तीन माह की हो जाने के बाद निश्चय ही अब वह बेबी नहीं रह गई है! वास्तव में लगता तो यह है कि वह जीवन के अगले चरण में प्रवेश कर चुकी है-और हमें यह अच्छा लग रहा है!
दिसंबर में, जब हम छुट्टी बिताने बाहर गए थे, हम अपरा को अजनबियों से मिलने पर "गुड मॉर्निंग" कह कर उनका अभिवादन करना और जब वे उसे टॉफी या कुछ दें तो "थैंक यू" कहना सिखा रहे थे। अक्सर, अपरा संकोच करती थी या झेंप जाती थी और अचानक चुप होकर, जहाँ उसे कुछ न कुछ कहना चाहिए, वहाँ एक शब्द नहीं बोलती थी। यहाँ तक कि वह टॉफी वापस कर देती थी जबकि हमने उसे सिखाया था कि टॉफी रखकर "थैंक यू" कहना है।
जब मेरा बचपन का मित्र, गोविंद हमसे मिलने आता था, वह दूसरे कमरे में चली जाती थी क्योंकि वह सबसे मिलने में संकोच करती थी। आश्रम में आए मेहमानों के साथ कुछ समय बाद वह सहज हो जाती थी और बहुत संकोच नहीं करती थी-लेकिन वह शुरुआती संकोच सबके साथ रहा करता था और इससे यह होता था कि सिर्फ एक दिन के लिए आने वाले मेहमानों से उसका मिलना-जुलना नहीं हो पाता था।
लेकिन अब इसमें परिवर्तन आ रहा है! कुछ दिन पहले हम चेक अप के लिए मोनिका को लेकर अस्पताल गए थे। जब मोनिका की पट्टियाँ बदली जा रही थीं तो मैं अपरा को लेकर फलों का रस और स्वीट कॉर्न लेने अल्पाहार गृह (कैफेटेरिया) चला गया। मैं उसे एक कुर्सी पर बिठाकर ऑर्डर देने चला गया।
मेरी नज़रें उस पर लगी हुई थीं और जो मैंने देखा, उससे आश्चर्यचकित रह गया: वह उसी टेबल पर बैठे एक पुरुष और एक महिला के साथ बातें करने में लगी हुई है। जब मैं वापस आया, उस महिला ने मेरी बेटी की उम्र पूछी और जब मैंने बताया कि वह तीन साल की है तो उसे बड़ा आश्चर्य हुआ और उसने कहा, "तीन साल के हिसाब से तो वह बहुत गप्प मारती है!"
कुछ देर बाद एक दूसरी महिला आई और अपरा से उसका नाम, उम्र और कहाँ रहती हो आदि पूछने लगी। अपरा ने नाम बताया, उम्र बताई और कहाँ रहती हो, के जवाब में कहा, "आश्रम में"। जब महिला ने पूछा कि "आश्रम कहाँ है" तो उसने जवाब दिया "इंडिया में"! हम सब हँस पड़े और मैंने उसे बताया कि हमारा आश्रम वृंदावन नामक एक शहर में है आर वृंदावन इंडिया नामक देश में है।
अभी एक दिन मेरा एक मित्र आया तो मुझे बड़ा आश्चर्य हुआ जब अपरा उसके साथ सारा दिन गपशप करती रही, फोटो खिंचवाती रही और उसके साथ खुलकर मौज-मस्ती करती रही!
कल जब गोविंद मिलने आया तब भी यही हुआ: उसने ज़रा सा भी संकोच नहीं दिखाया, उसके व्यवहार में झेंप का नामोनिशान नहीं था! उसने गोविंद को अपने स्कूल के बारे में बताया, जहाँ तक आती थी, गिनती सुनाई और हमारी बातूनी छोरी पूरे समय उसके साथ बातचीत में मगन रही!
ऐसा लग रहा है जैसे एक नए दौर का प्रारम्भ हुआ है- और मुझे उससे कोई शिकायत नहीं है!
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