माता-पिता की सबसे बड़ी ख़ुशी: अपने बच्चे को अधिक से अधिक खुश देखना – 11 सितम्बर 2014

शहर:
वीसबाडेन
देश:
जर्मनी

जो व्यक्ति जर्मनी की इस यात्रा का सबसे अधिक इंतज़ार कर रहा था वह थी अपरा! हमने एक सप्ताह पहले ही उसे बता दिया था कि हम वहाँ जाने वाले हैं-और तभी से उसकी ख़ुशी देखते ही बनती थी! ख़ुशी के मारे वह यहाँ-वहाँ उछलती-कूदती, नाचती-झूमती और हँसती-खिलखिलाती रहती। उसके बाद से जब भी हम जर्मनी का ज़िक्र छेड़ते, वह ख़ुशी से फूली न समाती, वह उसके शरीर से फूटी पड़ती थी और हम कह उठते कि वाकई उस जैसे बच्चे के चेहरे पर आप उसकी भीतरी दुनिया को स्पष्ट देख पाते हैं जबकि वयस्कों की यह दुनिया हज़ार पर्दों के पीछे छिपी होती है!

फिर वह हर किसी को बताती रही कि उन्हें उसके साथ जर्मनी जाने की अनुमति है या नहीं और बाद में तो यह उसके लिए एक तरह का खेल ही बन गया। जिस दिन हमें जाना था, वह जिद करने लगी कि वह खुद अपना सूटकेस पैक करेगी और फिर सूटकेस लेकर सारे आश्रम में यहाँ से वहाँ फिरती रही कि सब देख लें कि आज वह जर्मनी रवाना हो रही है।

विमानतल पर भी वह पूरी तरह जागी हुई थी और अपने छोटे से लाल सूटकेस को खुद लुढ़काते हुए सुरक्षा जाँच तक और बाद में दरवाजे तक ले जा सकती थी और उसने जिद करके यही किया भी। पूरे सफर में चाहे वह हवा में उड़ान भरते वक़्त हो या विमानतल पर हो, उसके चेहरे पर नए-नए आए आत्मविश्वास, उत्तेजना और रोमांच से पैदा हल्की मुस्कान देखते ही बनती थी।

बोर्डिंग के लिए हमें लंबी दूरी तक एस्केलेटर पर चलना पड़ा और लगता था हम एक ही एस्केलेटर पर सैकड़ों बार चढ़-उतर रहे हैं और हालाँकि हममें से एक अपरा के साथ ही होता था मगर अपरा के दिखते ही दूसरे को उसकी तरफ देखकर हाथ हिलाना पड़ता था।

हवाई जहाज़ में वह कंबल लपेटकर बैठ गई और घर से लाया हुआ खास नाश्ता उसने किया और साथ ही हवाई जहाज़ में मिलने वाली चीज़ें भी अच्छी तरह चखीं, जिसमें "नमक मिला लाल जूस" भी था, साथ लाई किताबें पढ़ीं, सामने के टीवी पर्दे पर बच्चों वाले खेल खेलती रही और अंत में थककर सुखद-संतुष्ट नींद में डूब गई।

लेकिन फ्रैंकफ़र्ट विमानतल पर उतरते ही उसका झूमते-मटकते, लंबे-लंबे डग भरते हुए और उछलते-कूदते हुए चलना सबसे मज़ेदार था। उसे आगे होने वाली घटनाओं का आभास हो गया था और उसकी प्रत्याशा में उसके चेहरे पर हल्की सी मुस्कान फैली हुई थी और वह छोटी-छोटी बातों को देखकर विस्मित होती और इशारों में हमें भी बताती जाती।

कल रात को, सोते समय रमोना ने कहा, 'आज का दिन बड़ा अच्छा रहा, हवाई जहाज़ पर भी और अब यहाँ!' और वह मुस्कुरा दी। आज सुबह, तड़के 4 बजे जब हम सब सोकर उठे, उसने कहा, 'हम फिर से जर्मनी में हैं!' और एक बार फिर मुस्कुराई।

मैंने जो देखा, सुना और महसूस किया उसे ही शब्दों में यहाँ व्यक्त करने की भरसक कोशिश की है लेकिन मुझे लगता है मैं उसमें असफल रहा हूँ। जब मैं अपनी बच्ची की तरफ देखता हूँ, उसकी आँखों में ख़ुशी की चमक, सहज, न रुकने वाली हँसी देखता हूँ, जब उसे नाचते-गाते, खेलते-कूदते देखता हूँ तो गदगद हो उठता हूँ मगर उस सुखद एहसास को, दिल में उमड़ती भावनाओं को शब्दों में व्यक्त करना मेरे लिए असंभव होता है।