आज हम लोग रात का खाना खाने बाहर गए थे और अपने पीज़ा का इंतज़ार करते हुए आज की छुट्टी के बारे में चर्चा कर रहे थे। जर्मनी में आज मई की पहली तारीख थी, मजदूर दिवस, और थॉमस और आइरिस ने बताया कि हर साल इस दिन लोग समूहों में सरकार और वर्तमान समाज व्यवस्था का विरोध और उसका प्रतिवाद करते हैं। और यह प्रतिवाद कई बार हिंसक भी हो जाता है और राष्ट्रीय सम्पदा को नुकसान पहुंचाने का कारण बन जाता है। वाहनों को आग के हवाले कर दिया जाता है और दुकानों और घरों में तोड़ फोड़ की जाती है। इससे विरोध करने वालों को कुछ भी प्राप्त नहीं होता। लोगों के घायल हो जाने की संभावना होती है और बहुत बड़ा आर्थिक नुकसान भी हो सकता है। लेकिन वे साल दर साल यह करते ही रहते हैं।
मैं जानता हूँ कि यह हर देश में होता है लेकिन मुझे समझ में नहीं आता कि क्यों कुछ लोगों का दिमाग हिंसा और विध्वंस में लिप्त होता है। यहाँ तक कि उन्हें इसमें मज़ा आने लगता है। ऐसा लगता है जैसे उनके लिए यह एक खेल और आनंद का बायस होता है जब कुछ टूटता है, कुछ नष्ट होता है या कोई घायल होता है या कोई आर्थिक नुकसान बरपा होता है।
जब मैं भारत में था तब मैंने किसी अखबार में पढ़ा कि सरकार ने इस तरह के हिंसक प्रतिवाद से निपटने के लिए अब एक कानून बना दिया है। जो समूह या संगठन इन हिंसक वारदातों में ज़िम्मेदार पाए जाते हैं या जो लोग मौका ए वारदात पर पकड़े जाते हैं उन्हें नष्ट हुई संपत्ति का मूल्य चुकाना पड़ता है। हम कई स्थानों में हमेशा ही ऐसा होता हुआ देखते हैं। आप समझ नहीं पाते कि लोग ऐसा क्यों करते हैं। अगर वे कुछ बना नहीं सकते तो फिर नष्ट क्यों करते हैं? मैं चाहता हूँ कि लोग अपनी संवेदना को जागृत करें और दूसरों को नुकसान पहुंचाने में खुशी तलाश करने से बाज आएँ।
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