बिना दमन किए, बिना कष्ट उठाए क्रोध से कैसे निपटें? – 7 मई 2008

शहर:
ल्युनेबर्ग
देश:
जर्मनी

आज का उपचार-सत्र बहुत लंबा चला। एक औरत आई और कहने लगी कि वह बहुत कष्ट में है और उसके मन में बहुत सारी कटुता और दुर्भावनाएँ भारी पड़ी हैं। तेरह साल के वैवाहिक जीवन के बाद उसके पूर्व-पति ने किसी दूसरी औरत की खातिर दो साल पहले उसे छोड़ दिया था। ऐसे ही एक दिन उसने सब बताया और दो दिन बाद वह चला गया। अब उसे पता चला है कि वह उस औरत के साथ जल्द ही शादी करने वाला है। वह मुझसे जानना चाहती थी कि उसे अंतिम रूप से मुक्त करने के लिए वह क्या करे। मेरे एक प्रश्न के जवाब में उसने बताया कि पिछले दो साल उसने बहुत मानसिक कष्ट और तनाव में बिताए। बाद में सिर्फ एक बार वे मिले थे और उसने जानना चाहा था कि उसने उसे क्यों त्याग दिया, उसकी गलती क्या थी। दोनों ही उस मुलाकात में बहुत रोए मगर उसके पूर्व-पति ने उसे छोडने का कोई कारण नहीं बताया।

यह सब बताते हुए वह औरत बहुत भावुक हो गई थी। मैं देख सकता था कि उसने कितना भीषण दुख सहा है और सह रही है मगर मैं यह भी समझ पा रहा था कि उसने अपने क्रोध और उसके उन्माद को नहीं जिया जो बहुत स्वाभाविक रूप से पति के अलगाव के बाद उसके भीतर समाये हुए थे। मैंने उसे बताया कि अपने आपको गुस्सा होने की इजाज़त देना कितना ज़रूरी है। अपने क्रोध को स्वीकार करना लाजिमी है। कोई आपके साथ ऐसा करता है तो क्रोध एक प्राकृतिक एहसास है। ठीक है कि यह एक नकारात्मक एहसास है मगर आप ऐसा महसूस करने पर बुरी नहीं बन जातीं। वह यथार्थ है और आपको उसे जीना है।

उसका पूर्व-पति उस भेंट में उसका सामना नहीं कर सका इसका अर्थ यह था कि वह स्वयं भी अपने भीतर ग्लानि का अनुभव कर रहा था। वह महिला अपने क्रोध को व्यक्त करने की जगह सिर्फ अकेली सब कुछ सहन करती रही। उसने मुझसे पूछा कि किस तरह वह अपने क्रोध को स्वीकार करे और कैसे उसे जिए? और मैंने उसे समझाया कि अपने क्रोध को वह बाहर निकाल सकती है।

हो सकता है मैंने पहले भी यह तरीका बताया हो : जब आप टोयलेट जाएँ तब एक कलम साथ ले जाएँ और टोयलेट पेपर पर उन बातों को लिखते जाएँ जो आपको गुस्सा दिला रही हैं। इस तरह लिखें जैसे वह आपके सामने बैठा है और अपने क्रोध को धीरे धीरे निकलने दें। जब आप सब कुछ लिख चुकें, उस टॉइलेट पेपर का वही उपयोग करें जिसके लिए वह बना है और फिर उसे पानी से संडास में बहा दें। तेज़ पानी के प्रवाह से बहा दें उसे!

उसने कहा कि वह इस मामले का कोई सुखद अंत चाहती है क्योंकि वह उसके साथ अपने संबंध को बड़ा महत्व देती है। उसने यह भी बताया कि उसके पूर्व-पति और उस औरत की शादी उसी दिन है जिस दिन दो साल पहले उसने उसे त्याग दिया था। मैंने जवाब दिया: अपने गुस्से को निकाल बाहर करने के बाद, उसे टोयलेट में बहा देने के बाद तुम्हें चाहिए कि उसे माफ कर दो और फिर उसे भूल जाओ। तारीख को भी याद मत रखो। किसलिए यह सब? इतना सब कर लेने के बाद तुम क्यों दुखी रहो, क्यों तड़पो, क्लेश सहो? अगर तुम इससे मुक्ति नहीं पातीं तो आगे 5-10 साल तुम और इसी तरह दुख और पीड़ा सहती रहोगी। अपने क्रोध का दमन करने के कारण दो साल तुमने इतना सब सहा। तो सबसे पहले अपने क्रोध को स्वीकार करो और उसे बाहर निकालो, फिर अपने पूर्व-पति को माफ करो और अंत में उसे भूल जाओ। जीवन में और भी न जाने कितनी खूबसूरत चीज़ें हैं। अब वह तुम्हारे जीवन का हिस्सा नहीं रहा। इस संसार का उपभोग करो और तुम फिर से खुश हो सकती हो, हंस-बोल सकती हो और प्रेम भी कर सकती हो।

मैं रोज़ ही कई लोगों से मिलता रहता हूँ और वे अपनी परेशानियाँ मुझसे साझा करते हैं। मैं उपचारक हूँ, मैं सलाह देता हूँ और परामर्श सत्र आयोजित कर उनकी परेशानियों को दूर करने का प्रयास करता हूँ। और कभी-कभी उन व्यक्तियों की वास्तविक पहचान ज़ाहिर किए बगैर इस डायरी में उनके उन अनुभवों को दर्ज करता हूँ क्योंकि मैं समझता हूँ कि मेरे कई पाठक इसी तरह की परिस्थितियों से गुज़र सकते हैं और ऐसी ही या इनसे मिलती जुलती समस्याओं से घिरे विकट मानसिक क्लेश से दो चार हो सकते हैं। यह डायरी सारी दुनिया में असंख्य लोग पढ़ते हैं और मुझे विश्वास है कि यह कुछ पाठकों को अवश्य लाभ पहुंचाती होगी या कुछ पाठक ऐसे भी होंगे जिनके कोई जानने वाले ऐसी परिस्थिति से गुज़र रहे हों और वे उन्हें उचित सलाह दे सकें।