मोह से कामना और कामना से क्रोध तक – 27 जुलाई 2008

क्रोध

कल मैं कामना और मोह के बारे बात कर रहा था। गीता में कहा गया है कि मोह से कामना उत्पन्न होती है। यदि कामना की पूर्ति नहीं होती तो वह क्रोध में परिवर्तित हो जाती है और क्रोध आपको अंधा बना देता है। क्रोध में आप सत्य को नहीं देख पाते और आपकी सद्बुद्धि जाती रहती है। जब आप अपनी सद्बुद्धि खो देते हैं तो आप अपना बहुत बड़ा नुकसान कर बैठते हैं। आवश्यक है कि आप प्रेम में लिप्त हों, मोह में नहीं। मैं पहले ही इस बारे में बहुत कुछ कह चुका हूँ। आपको प्रेम करना चाहिए। यही एकमात्र जरिया है जिससे आपको साक्षात सत्य के दर्शन होते हैं।

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