अहंकार और क्रोध से आवेशित प्रेम पवित्र नहीं होता – 9 जनवरी 2009

अपने पति से तलाक लेकर जीवन गुज़ार रही एक महिला से मैं मिला। उनके 10 और 12 साल की उम्र के दो बच्चे हैं। तलाक से पहले वह और उसके पति देखने वालों को एक आदर्श दंपति लगते थे। उनका एक आलीशान घर था और दोनों कलाकार थे और घर पर रहकर ही अपना काम किया करते थे। महिला उस दिन तक इस संबंध से बहुत प्रसन्न थी जिस दिन पुरुष ने बताया कि वह खुश नहीं है।

वह सोच भी नहीं सकती थी कि कभी ऐसे भी नौबत आ सकती है जब उसका और उसके पति का भविष्य साझा नहीं रहेगा। वह अपने बच्चों को लेकर घर से बाहर निकल गई। पहली बार जब बच्चे अपने पिता से मिलने उसके घर गए उन्होंने अपने खिलौने अपने साथ ले जाने चाहे मगर पिता ने इसकी इजाजत नहीं दी। उसने बच्चों से कहा, "ये खिलौने तुम्हारे हैं और जब तक तुम यहाँ रहते हो उनके साथ खेल सकते हो।" यही बात उसने बच्चों की माँ से भी कही।

जब मैं इसका विश्लेषण करता हूँ तो पाता हूँ कि पिता के लिए अपना अहं अपने बच्चों से भी ज़्यादा महत्वपूर्ण था। क्यों, क्या कारण हो सकता है कि उसने अपने बच्चों को उनके खिलौने साथ ले जाने से रोक दिया जबकि उसी ने अपने बच्चों के लिए वे खिलौने खरीदे थे? वह स्वयं तो उन खिलौनों से खेलने से रहा लेकिन उसका अहं उसे मना कर रहा है, "मैंने ये खिलौने अपने पैसों से खरीदे हैं; तुम उन्हें अपनी माँ के घर नहीं ले जा सकते।" अगर वे उन्हें ले भी जाते तो उनकी माँ उन खिलौनों से खेलने वाली नहीं थी; उसी के बच्चे खेलने वाले थे। उसका अहं उसके भीतर यह भावना पैदा कर रहा है कि उसकी पूर्व-पत्नी उसकी दुश्मन है और यह भावना इतनी मजबूत है कि वह यह भी बर्दाश्त नहीं कर सकता कि उसके बच्चे उन खिलौनों के साथ खेलने का सुख प्राप्त कर सकें। मैं उसके अहं में क्रोध का भी अंश देख पा रहा हूँ। यह अपनी पूर्व-पत्नी के प्रति उसके दिल में बसा क्रोध ही है जो अपनी पत्नी को थोड़ा भी खुश देखकर शांत और प्रसन्न नहीं रह सकता। कई दूसरे मामलों में भी मैं यही बात देखता हूँ।

कभी कभी अहं और क्रोध दिल में इतना अंधकार पैदा कर देता है कि आप अपने बच्चों की खुशी की भी परवाह नहीं करते। भले ही आपके दिल में बच्चों के लिए प्रेम बरकरार है। मगर मैं यह कहना चाहूँगा कि यह प्रेम पवित्र नहीं है। यह प्रेम अहं के द्वारा संचालित है, "मैं उनसे प्यार करता हूँ क्योंकि वे मेरे बच्चे हैं। वे खुश क्यों हों जब वे अपनी माँ के साथ रहते हैं?" मैं लोगों से कहना चाहता हूँ कि कृपया अपने आपका विश्लेषण करें, अपनी अंतरात्मा को टटोलें और सुनिश्चित करें कि आपका अहं आपके प्रेम से बड़ा न हो जाए।

Related posts

दीर्घ श्वासोच्छ्वास आपको क्रोध से बचाता है - 25 जनवरी 10

दीर्घ श्वासोच्छ्वास आपको क्रोध से बचाता है – 25 जनवरी 10

स्वामी बालेन्दु उस स्तिथी की चर्चा करते हैं जब आप क्रोध में चीजें उठाकर फेकने और लात घूसा चलाने की ...
लड़ाके लड़ाई जारी रखना पसंद करते हैं - 5 जुलाई 2009

लड़ाके लड़ाई जारी रखना पसंद करते हैं – 5 जुलाई 2009

स्वामी बालेन्दु अलग अलग लोगों के व्यक्तित्व और स्वभाव के विषय में लिखते हैं कि कुछ लोग तो लड़ाके होते ...
हिंसा और दंगा: विध्वंस से आपको क्या प्राप्त होता है? - 1  मई 2009

हिंसा और दंगा: विध्वंस से आपको क्या प्राप्त होता है? – 1 मई 2009

स्वामी बालेन्दु लिखते हैं कि कैसे कुछ लोगों को तोड़फोड़ और दंगों में मज़ा आता है, लगता है कि जब ...
मोह से कामना और कामना से क्रोध तक - 27 जुलाई 2008

मोह से कामना और कामना से क्रोध तक – 27 जुलाई 2008

स्वामी बालेन्दु गीता के अनुसार क्रोध का कारण बताते हैं| ...
अपने क्रोध को प्रेम से परास्त करो - 20 जुलाई 2008

अपने क्रोध को प्रेम से परास्त करो – 20 जुलाई 2008

स्वामी बालेन्दु लिखते हैं कि कैसे एक लड़की अपने प्रेमी के गुस्सैल होने की वजह से अपने सम्बन्ध उससे ख़त्म ...
जब क्रोध आये तो क्या करें? - 5 जून 2008

जब क्रोध आये तो क्या करें? – 5 जून 2008

स्वामी बालेन्दु इस प्रश्न का उत्तर देते हैं कि जब क्रोध आये तो क्या करें? ...
बिना दमन किए, बिना कष्ट उठाए क्रोध से कैसे निपटें? - 7 मई 2008

बिना दमन किए, बिना कष्ट उठाए क्रोध से कैसे निपटें? – 7 मई 2008

स्वामी बालेन्दु गुस्से से निपटने के कुछ व्यावहारिक उपाय बता रहें हैं| ...

Leave a Reply