अपने क्रोध को प्रेम से परास्त करो – 20 जुलाई 2008

क्रोध

कल एक और 17 साल की लड़की उपचार सत्र में उपस्थित हुई थी। जब मैंने उससे उसके आने का कारण पूछा तो उसने बताया कि वह एक लड़के को भूलना चाहती है। उस लड़के के साथ एक साल तक उसके संबंध रहे और अब वह उस संबंध को तोड़ना चाहती थी क्योंकि वह लड़का ‘एक गुस्सैल व्यक्ति’ था। उसने बताया कि अभी भी उसके साथ उसका संबंध है और वह उसे भूल नहीं पाएगी। मैंने पूछा कि जब वह उसे भूलना चाहती है तो संबंध क्यों रखे हुए है; अगर वह उससे मिलती रहेगी तो भूल कैसे पाएगी? तब उसने कहा कि उसके साथ संबंध न रखना बेहद मुश्किल काम है। वह इस बात पर निश्चित थी कि वह अब भी उससे बहुत अधिक प्रेम करता है और यह भी कि वह यह नहीं कह सकती कि वह उससे प्रेम नहीं करती। तो इसका मतलब यह हुआ कि दोनों एक दूसरे को अब भी बहुत प्रेम करते हैं मगर उसकी गुस्सैल प्रवृत्ति के कारण वह उसके साथ नहीं रहना चाहती।

कोई भी क्रोध नहीं करना चाहता। ऐसी भावनाएं क्यों पैदा होती हैं? इसका कारण पता करना आवश्यक है और उसके बाद या तो उस कारण को दूर करना आवश्यक है या फिर उसका सामना करने के अपने तरीके को बदलना आवश्यक है। आप जानते हैं, मैं भावनाओं का दमन करने की सलाह नहीं दे रहा हूँ। मैंने अपनी डायरी में क्रोध पर पहले भी लिखा है और अगर आप प्रेम और क्रोध की तुलना करें तो पाएंगे कि प्रेम हमेशा विजयी हुआ है। इसलिए अगर आप जानते हैं कि आप क्या चाहते हैं, आप अगर अपने क्रोध पर विजय पाना चाहते हैं तो प्रेम की सहायता से आप ऐसा कर सकते हैं। और प्रेम से अच्छा कारण क्या होगा ऐसा करने का?

तो आज हमने जर्मनी के लिए वापसी की उड़ान भरी और आन्द्रे हमें म्यूनिख एयरपोर्ट पर लेने आया। शाम को हम एक संगीत सभा में गए जिसे सूसी के स्कूल की ओर से आयोजित किया गया था और जिसमें वहाँ के विद्यार्थी ही अभिनेता, गायक और नर्तक थे और उन्होंने ही, सूसी की तरह, वाद्यवृंद की रचना की थी। यह पहला मौका था जब मैं किसी संगीत सभा में शामिल हुआ था और मुझे यह बहुत अच्छा लगा। वह अधिकतर जर्मन में था इसलिए मैं पूरी तरह समझ नहीं पाया मगर बावजूद इसके उसका आनंद अवश्य उठाया। मैं सेनेमा और टीवी देखना उतना पसंद नहीं करता लेकिन यह एक शानदार शाम थी।

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