एक उपचार सत्र में किसी ने मुझसे पूछा: "मैं बहुत आक्रामक हूँ और अकसर बिना किसी इच्छा के या दुर्भावना के दूसरों पर चिल्लाने लगता हूँ। मैं अपने इस क्रोध का सामना किस तरह कर सकता हूँ?"
मैंने उसे एक बहुत व्यावहारिक सलाह दी: जब किसी के साथ आपकी कोई चर्चा हो रही हो और लगे कि आपको गुस्सा आने वाला है और आप उस पर चीखने-चिल्लाने वाले हो, आप एक गिलास पानी लेकर उसे पी जाओ। एक गहरी सांस लो और शांत हो जाओ। जब आप गुस्सा होते हैं तब क्या होता है? मैं हमेशा कहता हूँ कि तब आपकी आँखें बंद हो जाती हैं और मुंह खुल जाता है। मेरा कहने का मतलब है कि चेहरे पर स्थित आँख बंद नहीं होती मगर आप महसूस नहीं कर पाते कि वह क्या देख रही है। आप देख नहीं पाते कि आपके सामने कौन खड़ा है, आप क्या कर रहे हैं, आप क्या कह रहे हैं और परिस्थिति कैसी है। तो आप खुली आँखों वाले अंधे होते हैं।
क्रोध आपको दिशा निर्देश दे रहा है और आपके माध्यम से बात कर रहा है। वह आपका सत्य नहीं है जो बात कर रहा है और इसीलिए कई बार आपने देखा होगा कि बाद में अपनी बात पर आपको पछतावा भी होता है। आवश्यक है कि समय रहते ही आप अपनी आँखें खोलें और मुंह बंद कर लें। आँखें खोलने का अर्थ यह है कि आपको यह पता होना चाहिए कि आप क्या कर रहे हैं। कोशिश करें कि जब क्रोधित हों तब आप चुप रहें। इससे आपको अपने भीतर देखने और सोचने में मदद मिलेगी। जब आप चिल्ला रहे होते हैं तब दिमाग में सोचने के लिए कोई स्थान नहीं होता। चीखना-चिल्लाना व्यर्थ होता है और यह दूसरों की भावनाओं को चोट पहुंचा सकता है।
क्रोध एक आग है जो आपको जलाती है और दूसरों को भी। जब क्रोध आता हुआ महसूस हो तब इससे पहले कि वह आपके शब्दों के माध्यम से, जिन्हें आप स्वयं कहना नहीं चाहते, दूसरों को चोट पहुंचा सके आप पानी पीना शुरू कर दीजिये और अपने हार्मोन्स को शांत होने का मौका दीजिये। मैं यह नहीं कह रहा हूँ कि आप अपनी भावनाओं का दमन करें। अपनी भावनाएं व्यक्त करना आवश्यक है। आप अपने गुस्से को बिना दूसरों को चोट पहुंचाए भी व्यक्त कर सकते हैं। आपके गुस्से के कारण दूसरे क्यों कष्ट पाएँ? जब आप महसूस करें कि क्रोध आपको भीतर ही भीतर जला रहा है एक तकिया ले लें और उस पर मुक्के मारना शुरू कर दें। अपने क्रोध को बह जाने दें! अपने आपको गुस्सा होने दें! दमन किसी भी हालत में उचित नहीं है।
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