खरीददारी की लत – वह वस्तुएं जिनकी आपको जरूरत नहीं है फिर भी आप खरीदते हैं – 1 सितम्बर 08

शहर:
वीसबाडेन
देश:
जर्मनी

आज मैं आपसे खरीददारी के विषय में बात करना चाहता हूं। ये केवल महिलाओं का विषय ही नहीं रहा। अब पुरुष और महिलाएं दोनों ही खरीददारी के आदी हो चुके हैं। मैं नहीं जानता कि वास्तव में इसकी शुरूआत कैसे हुई, शायद 80 या 90 के दशक में हुई थी पर तब से इसका बहुत ज्यादा विकास हो चुका है। अब बाजार में ऐसे बड़े ब्रांड और कंपनियां हैं जो ऐसा माहौल बनाती हैं कि उपभोक्ता उत्पाद को खरीदे। चाहे उपभोक्ता को उस उत्पाद की आवश्यकता ही न हो।

टीवी पर विज्ञापन, ‘समर सेल’, ‘एक के साथ एक मुफ्त’ जैसे सस्ती बिक्री के अवसर आज हर जगह है। इसका परिणाम क्या होता है? लोग वो सामान खरीद लेते हैं जिनकी आवश्यकता उन्हें नहीं होती। जब आप शहर में दुकानों को देखते हैं तो अनावश्यक वस्तुएं भी दिखती हैं। फिर भी लोग उन्हें खरीद लेते हैं। खरीददारी तो अब जरुरत का नहीं बल्कि बोरियत दूर करने का जरिया बनने लगी है। मैं तो तभी कुछ खरीदना चाहूँगा जब मुझे उसकी आवश्यकता हो।

हालांकि लोगों के विचार अलग-अलग होते हैं। किसी अनावशयक वस्तु को खरीदना पैसे की बर्बादी है। यहां मैं आपके घर की सजावट की वस्तुओं की बात नहीं कर रहा हूँ। अगर आप कोई चित्र या मूर्ति खरीदते हैं तो इसे अपने घर में देखकर आपको खुशी मिलती है। इसलिए ये पैसे की बर्बादी नहीं है। अपनी लत के तहत पैसे खर्च करना बिना ये सोचे कि आप किस चीज पर खर्च कर रहे हैं। ये पैसे की बर्बादी है। ये पैसा किसी गरीब को देकर आप इसे लाभकारी बना सकते हैं। बहुत से लोग ऐसे हैं जिनके पास जरुरत की चीजें खरीदने तक के पैसे नहीं हैं।

शायद आप भारत के किसी गरीब के बारे में सोचने लगे होंगे। ये सच भी है कि ऐसे कई लोग हैं जो बेहद जरुरत का सामान ही खरीदते हैं और कई बार तो उन्हें खरीद पाने में भी असमर्थ होते हैं। कई अमीर लोग भी हैं जो पानी की तरह पैसा बहाते हैं। उदाहरण के लिए अपने बच्चों की शादी पर। ये अमीर भारतीय लोग शादी पर आसानी से सैकड़ों हजारों यूरों खर्च करते हैं। ये एक व्यापार बन गया है जिसका मूल उद्देश्य है अपनी धन-दौलत का प्रदर्शन करना। अगर आप इस विषय पर किसी से बात करना चाहेंगे तो वो आपसे यही कहेगा कि मुझे अपने पैसों को खर्च करने का पूरा अधिकार है। यहां बात ये है कि आपका अपनी खुशियों पर कितना खर्च करना उचित है और कितना पैसे की बर्बादी है। मैं कंजूस नहीं हूँ और हमेशा लोगों को खुश रहने को कहता आया हूँ। लेकिन जब खरीददारी की आदत जुए की लत जैसा रूप धारण कर ले, जब आपका घर दिन-ब-दिन चीजों से भरता जाए और जब आप शहर में घूमने निकले और देखे कि दुकानों में भरी अनावश्यक चीजें तो आपके पास पहले से मौजूद हैं। तब आपको सोचना चाहिए कि पैसा कहां खर्च हो रहा है।

मुझे जल्दी हवाईअड्डे पहुँचना है। हमारा सामान पहले ही गाड़ी में है। आपसे कल भारत में मिलता हूँ।