गांधी को भूले अन्ना – अन्ना हजारे ने किया शराबियों को पीटने का समर्थन – 28 नवम्बर 11

अन्ना को आधुनिक महात्मा गांधी कहा जाता है। उनमें गांधी की छवि देखी जाती है। रामलीला मैदान में हुए अनशन के दौरान मंच पर लगी महात्मा गांधी की भव्य प्रतीमा इस बात की साक्षी है। पर गांधीवादी अन्ना के विचारों में द्वंद देखा गया। उन्होंने नशे के आदी लोगों को पीटने का समर्थन किया। उन्होंने कहा कि उनके गाँव में शराबियों के साथ ऐसा ही व्यवहार किया जाता था।

अन्ना हजारे ने कहा कि नशे के आदी लोगों को तीन बार चेतावनी देनी चाहिए कि, ये उनकी सेहत के लिए अच्छी नहीं है। अगर वो नहीं छोड़ता, तो उसे मंदिर में ले जाकर भगवान की कसम दिलानी चाहिए कि आज के बाद वो शराब को हाथ भी नहीं लगाएगा। इस पर भी वो न माने, तो सार्वजनिक स्थान पर एक खंभे से बांधकर उसकी पिटाई की जानी चाहिए।

ये वही शख्स है जिनमें लोगों ने अहिंसावादी महात्मा गाँधी की छवि देखी थी। यह शराबियों के लिए हिंसा की बात कर रहे हैं। कांग्रेस और बीजेपी अभी तक कह रहे थे कि हम अन्ना के खिलाफ नहीं हैं। अन्ना के इस बयान के बाद कह रहे हैं कि हम लोगों के साथ हिंसा का समर्थन नहीं करते। जो लोग अभी तक अन्ना हजारे के अभियान से डरे हुए थे, अब उन्हें एक अच्छा मुद्दा मिल गया है। कांग्रेस के प्रवक्ता ने कहा कि ये तालिबानी तरीका है। अगर इस तरीके को लागू किया गया तो आधा केरला, तीन चौथाई आंध्र प्रदेश और लगभग चौथे-पाँचवें पँजाब के भाग को पीटा जाएगा। मेरा मानना है अन्ना को गाँधी के रूप में देखने की छवि अब पूरी तरह धूमिल हो गई है।

मैं अपने लेखन के माध्यम से लगातार भ्रष्टाचार के खिलाफ हो रही लड़ाई में शामिल था। मैंने अन्ना को पत्र लिखा। मनमोहन सिंह को पत्र लिखा और लोगों से अपील की कि अन्ना को न रोके। हमें आज भ्रष्टाचार के खिलाफ एकजुट होकर चलना है। हालांकि मैंने शुरु से ही कहा है कि किसी इंसान को पूजना ठीक नहीं है, भ्रष्टाचार को समाप्त करने पर ध्यान देना ज्यादा जरूरी है। यहां गौर करने वाली बात है कि अन्ना हजारे भ्रष्टाचार के मुद्दे से ज्यादा महत्वपूर्ण हो गए थे। मैंने उनमें अहम भी देखा। मीडिया भी मुद्दे पर ध्यान देने के बजाय अन्ना हजारे पर ध्यान दे रही थी। मैं भ्रष्टाचार के खिलाफ हो रही लड़ाई के साथ था न कि किसी व्यक्ति के साथ। मैं उनके बयान का समर्थन नहीं करता।

उन्होंने उन सभी लोगों को निराश किया है जो उनको धर्मात्मा मानने लगे थे। अगर आप व्यक्ति से धर्मात्मा के रूप में कार्य की अपेक्षा करेंगे तो आप निराश ही होंगे। उन्होंने वही कहा है जो वो सोचते हैं। बेशक उन्होंने राजघाट पर बैठकर ध्यान किया था, लोग उनकी तुलना महात्मा गाँधी से करने लगे थे। क्या आपको लगता है कि महात्मा गाँधी कभी शराबी को पीटने के पक्ष में होते? शराबी वैसे ही कमजोर होते हैं। उनकी लत की वजह से उनको पीटकर या समाज में डराकर प्रताड़ित करने से समस्या का हल नहीं निकलेगा। आपको ये समझना होगा कि वो कैसे इसका आदी हुआ। आप उसकी समस्या समझ जांएगे तो उसके लिए कुछ कर भी सकते हैं। जबकि हिंसा इस मामले में कोई सहायता नहीं कर सकती। जो लोग नशा छोड़ना चाहते हैं उन्हें अन्ना ने ध्यान करने को कहा होता तो अच्छा होता।

एक ओर अन्ना ने राष्ट्रीय समस्याओं और उनके हल के बारे में बात की तो दूसरी ओर नशे के आदी लोगों के लिए हिंसा का समर्थन किया। गाँव में समस्याओं से निपटने का यही तरीका रहा है। गाँव की अदालत में कुछ गिने-चुने लोग सजा सुना देते हैं। इन सजाओं में ज्यादातर पीटना शामिल होता है। आधुनिक समय में यह तरीका ठीक नहीं बैठता। अन्ना ने इस बयान के बाद अपनी प्रतिष्ठा खो दी है।

इसका अर्थ यह नहीं है कि भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ी जाने वाली जंग अब समाप्त हो गई है। क्योंकि ये अन्ना हजारे की बात नहीं थी। लोग और मीडिया उन्हें मुक्तिदाता के रूप में देखे इससे भी फर्क नहीं पड़ता। मुद्दा है भ्रष्टाचार, लोगों में क्षमता है कि वो एकजुट होकर फिर से उठें और इसे जड़ से समाप्त कर दें।

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